23/01/2017    ज़िंदगी के विभिन्न पहलुओं से रूबरू कराने का अंदाज, कहानी और ग़ज़ल की जुबानी..
साक्षी इंटरनेशनल फेस्टिवल ऑफ कल्चर के अन्तर्गत गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर कार्यक्रम आयोजितनई दिल्ली, 22 जनवरी 2016, गणतन्त्र दिवस नज़दीक है और इसका जश्न मनाने हेतु तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं, साथ ही अपने देश की कला-संस्कृति का बखान, प्रचार-प्रसार करते सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।

 इसी क्रम में गैर सरकारी संस्था साक्षी द्वारा पिछले वर्ष से शुरू किये गये ‘साक्षी इंटरनेशनल फेस्टिवल ऑफ कल्चर’ के अन्तर्गत ‘जश्न-ए-तहजीब’ श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। 
नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेन्टर में आयोजित किये गये इस कार्यक्रम को तीन भागों में बांटा गया था, जहां पहला भाग जाने-माने मीडियाकर्मी तेजेन्द्र शर्मा का, जहां उन्होंने कहानी कहने के अपने अलग अंदाज को दर्शाया। दूसरे भाग में कवि व पत्रकार प्रताप सोमवंशी की ग़ज़लों का संग्रह ‘दास्तां कहते कहते, इतवार छोटा पड़ गया’ का विमोचन किया गया। साहित्य के रंगों में डूबे इस कार्यक्रम का तीसरा भाग अपने अंदाज के लिए प्रसिद्ध ग़ज़लकार शकील अहमद की ग़ज़लों के नाम रहा, जहां हमेशा की तरह उन्होंने उपस्थित श्रोताओं की वाह-वाही लूटी। कार्यक्रम की अध्यक्षता लक्ष्मी शंकर बाजपेयी ने की। कार्यक्रम की शुरूआत पारम्परिक द्वीप प्रज्जवलन के साथ हुई। इसके बाद साक्षी एवम् जश्न-ए-तहजीब की अध्यक्ष डॉ. मृदुला टंडन ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर अपनी श्रृंखला के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम की जानकारी दी और तेजेन्द्र शर्मा को कथाकारी के अपने अंदाज प्रस्तुत करने हेतु मंच पर आमंत्रित किया।
‘सुन लो कहानी तेज की जुबानी’ भाग के अन्तर्गत तेजेन्द्र शर्मा ने ‘मौत - एक मध्यांतर’ से उपस्थित श्रोताओं को रूबरू कराया। विषय बहुत संजीदा और चौंकाने वाला था लेकिन जिस तरह से उन्होंने इस कथा का रूपान्तरण किया वह दिल छूने वाला रहा। कहानी ऐसे पात्र की थी जो कैंसर से पीड़ित है और उसके पास बहुत कम समय है। बावजूद इसके यह पात्र अपनी पत्नी के साथ वार्तालाप में है और उन्हें प्रेरित कर रहा है खुशहाल जीवन जीने के लिए, जहां वह भी उनके दिल में उनके साथ जीवंत रहेंगे। यहां यह जानना विशिष्ट अनुभव था कि एक महिला जिसे अपने जीवन में पति का पूरा साथ नहीं मिला और अब जब मिला तो यह समय ऐसा था कि उन्हें पता था उनका पति दुनिया से जाने वाला है फिर भी वह खुश है। कथाकारी का अंदाज देखते-सुनते बनता था एक मार्मिक कहानी, तेजेन्द्र की जुबानी कुछ को भावुक कर गयी तो कुछ ने उनके इस अंदाज की जमकर प्रशंसा की और उनसे इस कहानी से जुड़े सवाल भी पूछे और इन दो पात्रों के जीवन के पहलुओं को जाना।
प्रताप सोमवंशी का ग़ज़ल संग्रह ‘दास्तां कहते कहते, इतवार छोटा पड़ गया’ के साथ प्रताप सोमवंशी ने इस दास्तां के विषय में बताया। किस तरह से ज़िंदगी के विभिन्न पहलुओं में जिंदगी की दास्तां चलती चली जा रही है, हर वर्ग एक ऐसी दास्तां में लिप्त है जहां बहुत कहानियां हैं और यह जिंदगी की छोटी-बड़ी दास्तां ऐसी हैं जो जब मिलती हैं तो सम्पन्न हो जाती है। इस दौरान प्रताप सोमवंशी ने बहुत हल्के-फुल्के अंदाज में वर्तमान समय की गतिविधियों पर चुटकी ली और अपने अनुभवों से सभी को परिचित कराया। कार्यक्रम का तीसरा व अंतिम पड़ाव ग़ज़लों का रहा जहां उस्ताद शकील अहमद ने अपने चिर-परिचित अंदाज में प्रताप सोमवंशी के संग्रह सहित कुछ अन्य ग़ज़लें प्रस्तुत की और जमकर वाह-वाही लूटी। 
कार्यक्रम के विषय में डॉ. मृदुला टंडन ने कहा, आज का समय बहुत सारी गतिविधियों से घिरा है। एक तरफ हम गणतन्त्र दिवस का जश्न मनाने को तैयार हैं वहीं दूसरी और एक छोटे से मुद्दे को ज्वलंत बना दिया जाता है। इन सभी की बीच आवाम सर्वाधिक प्रभावित हो रहा है ऐसे में जरूरत है शांति का संदेश देने की। युवाओं को अधिक से अधिक साहित्य, कला संस्कृति से जोड़ने की जिससे न केवल वह इसके प्रचार-प्रसार से जुड़े, इसे समझें। साक्षी इंटरनेशनल फेस्टिवल ऑफ कल्चर के माध्यम से हमारा प्रयास यही है कि अपने देश की व्यापक कला-संस्कृति, साहित्य, संगीत आदि का प्रचार-प्रसार करें और अपनी गंगा-जमुनी तहजीब की खूबसूरती का गुंजायमान करें।
मौके पर प्रख्यात ग़ज़लकार व शायर फरहत शहजाद भी उपस्थित थे। उन्होंने कार्यक्रम को एक अच्छा प्रयास बताते हुए कहा कि जीवन के अलग-अलग पड़ाव के चलते कहानियों, किस्सों, गीत, ग़ज़ल को जन्म मिलता है और जिस तरह से तेजेन्द्र शर्मा ने अपने अंदाज में कहानी को बयां किया, प्रताप सोवंशी ने सरल व संजीदा अंदाज में ग़ज़लों को लिखा और उस पर शकील अहमद की गायकी एक शानदार व अपनी तरह का जश्न मनाने जैसा है


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