22/02/2019    कैसे और कब मनाएं श्रीमहाशिवरात्रि ? -मदन गुप्ता सपाटू ,
इस बार महाशिवरात्रि का महा पर्व मनाने में तिथि के विषय में ज्योतिषीय मतभेद तथा असमंजस की स्थिति है। चूंकि सरकारी अवकाश 4 तारीख को होने के कारण कुछ स्थानों पर इसे 4 को मनाया जा रहा है और कहीं इसे 5 तारीख को ही मनाने का निर्णय लिया जा चुका है।

बहरहाल इसे दोनों दिन भी मनाया जा सकता है
इस साल शिवरात्रि पर चतुर्दशी , 4 मार्च सोमवार की सायं 4 बजे कर 29 मिनट पर आरंभ होगी। एक धारणा के अनुसार , धनिष्ठा नक्षत्र के अंतर्गत, महा शिवरात्रि का व्रत मंगलवार  5 मार्च को रखा जाना शास्त्रसम्मत होगा। वस्तुतः शास्त्रों एवं पुराणों के अनुसार निशीथ व्यापिनी फाल्गुन चतुर्दर्शी पर भगवान शिव की आराधना का एक अपना महत्व है। इस तिथि के स्वामी भगवान शिव माने गए हैं। अर्थात भगवान शिव की तिथि ही चतुर्दशी मानी जाती है। अतः 5 तारीख को ही शिवरात्रि मनाना शास्त्र सम्मत रहेगा और फलदायी सिद्ध होगा। 
इस अवसर पर शुक्र ग्रह श्रवण नक्षत्र में चले जाएंगे और बुध वक्री होे जाएंगे। यही नहीं पंचक भी आरंभ हो जाएंगे जो 9 तारीख तक रहेंगे।
इसके लिए शास्त्रों के अनुसार निम्न नियम तय किए गए हैं.
1चतुर्दशी पहले ही दिन निशीथव्यापिनी हो तो उसी दिन महाशिवरात्रि मनाते हैं; रात्रि का आठवां मुहूर्त निशीथ काल कहलाता है: सरल शब्दों में कहें तो जब चतुर्दशी तिथि शुरू हो और रात का आठवाँ मुहूर्त चतुर्दशी तिथि में ही पड़ रहा हो, तो उसी दिन शिवरात्रि मनानी चाहिए
2 चतुर्दशी दूसरे दिन निशीथकाल के पहले हिस्से को छुए और पहले दिन पूरे निशीथ को व्याप्त करे, तो पहले दिन ही महाशिवरात्रि का आयोजन किया जाता है.
3 उपर्युक्त दो स्थितियों को छोड़कर बाक़ी हर स्थिति में व्रत अगले दिन ही किया जाता है-
महाशिवरात्रि का शुभ मुहूर्त
निशीथ काल पूजा मुहूर्त -24:08 से 24:57 तक अवधि --0 घंटे 49 मिनट
महाशिवरात्री पारणा मुहूर्त - 06:43 से 15:29 तक 5 मार्च को
इस दिन काले तिलों सहित स्नान करके व व्रत रख के रात्रि में भगवान शिव की विधिवत आराधना करना कल्याणकारी माना जाता है। दूसरे दिन अर्थात अमावस के दिन मिष्ठान्नादि सहित ब्राहम्णों तथा शारीरिक रुप से अस्मर्थ लोगों को भोजन देने के बाद ही स्वयं भोजन करना चाहिए। यह व्रत महा कल्याणकारी होता है और अश्वमेध यज्ञ तुल्य फल प्राप्त होता है।
इस दिन किए गए अनुष्ठानों , पूजा व व्रत का विशेष लाभ मिलता है। इस दिन चंद्रमा क्षीण होगा और सृष्टि को ऊर्जा प्रदान करने में अक्षम होगा। इसलिए अलौकिक शक्तियां प्राप्त करने का यह सर्वाधिक उपयुक्त समय होता है जब ऋद्धि- सिद्धि पा्रप्त होती है। इस रात भगवान शिव का विवाह हुआ था।
भारतीय जीवन में ऐसे लोक पर्व वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में भले ही धूमिल हो रहे हों परंतु इनका वैज्ञानिक पक्ष आस्था के आगे उजागर हो नहीं पाता। भारतीय आस्था में चाहे सूर्य ग्रहण हो या कुंभ का पर्व, दोनों ही समान महत्व रखते हैं। शिव रात्रि एक ऐसा महत्वपूर्ण पर्व है जो देश के हर कोने में मनाया  जाता है।
यह पर्व भगवान शिव एवं माता पार्वती के मिलन का महापर्व कहलाता है। इस व्रत से साधकों को इच्छित फल,धन, वैभव, सौभाग्य, सुख समृद्धि, आरोग्य, संतान आदि की प्राप्ति होती है।
  मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ में इसी दिन मध्य रात्रि भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रुप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में  इसी दिन प्रदोश के समय  शिव तांडव करते हुए ब्रहाण्ड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसी लिए, इसे  महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा जाता है।  काल के काल और देवों के देव महादेव के इस व्रत का विशेष महत्व है। एक मतानुसार इस दिन को शिव विवाह के रुप में भी मनाया जाता है। ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को अर्द्धरात्रि के समय करोड़ों सूर्य के तेज के समान ज्योर्तिलिंग का प्रादुर्भाव हुआ था।
स्कंद पुराण के अनुसार - चाहे सागर सूख जाए, हिमालय टूट जाए, पर्वत विचलित हो जाएं परंतु शिव-व्रत कभी निष्फल नहीं जाता। भगवान राम भी यह व्रत रख चुके हैं।
व्रत की परंपरा
प्रातः काल स्नान से निवृत होकर एक वेदी पर ,कलश  की स्थापना कर गौरी शंकर की मूर्ति या चित्र रखें । कलश  को जल से भर कर  रोली, मौली , अक्षत, पान सुपारी ,लौंग, इलायची, चंदन, दूध,दही, घी, शहद, कमलगटटा्,, धतूरा, विल्व पत्र, कनेर  आदि अर्पित करें और शिव की आरती पढ़ें । रात्रि जागरण में शिव की चार आरती का विधान आवश्यक माना गया है। इस अवसर पर शिव पुराण का पाठ भी कल्याणकारी कहा जाता है।
विशेषः चेतावनी
बेल पत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय हैं। बेल पत्र के तीनों पत्ते पूरे हों ,टूटे न हों । इसका चिकना भाग शिवलिंग से स्पर्श करना चाहिए। नील कमल भगवान शिव का प्रिय पुष्प माना गया है। अन्य फूलों मे कनेर,आक, धतूरा, अपराजिता,,चमेली, नाग केसर, गूलर आदि के फूल चढ़ाए जा सकते है। जो पुष्प वर्जित हैं वे हैं- कदंब,केवड़ा,केतकी। फूल ताजे हों बासी नहीं ।
इस दिन काले वस्त्र न पहनें। इसमें तिल का तेल प्रयोग न करें। पूजा में अक्षत ही चढाएं। टूटे चावल न चढ़ाएं।
भगवान श‌िव को सफेद फूल बहुत पसंद होता है लेक‌िन केतकी का फूल सफेद होने के बावजूद भोलेनाथ की पूजा में नहीं चढ़ाना चाहिए। भगवान श‌िव की पूजा करते समय शंख से जल अर्प‌ित नहीं करना चाहिए। भगवान श‌िव की पूजा में तुलसी का प्रयोग वर्ज‌ित माना गया है। शिव की पूजा में तिल नहीं चढ़ाया जाता है। तिल भगवान व‌िष्‍णु के मैल से उत्पन्न हुआ माना जाता है, इसल‌िए भगवान व‌िष्‍णु को त‌िल अर्प‌ित क‌िया जाता है लेक‌िन श‌िव जी को नहीं चढ़ता है।भगवान शिव की पूजा में भूलकर भी टूटे हुए चावल नहीं चढ़ाया जाना चाहिए। शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर नारियल का पानी नहीं चढ़ाना चाहिए। शिव प्रतिमा पर नारियल चढ़ा सकते हैं, लेकिन नारियल का पानी नहीं। हल्दी और कुमकुम उत्पत्ति के प्रतीक हैं, इसलिए पूजन में इनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। बिल्व पत्र के तीनों पत्ते पूरे होने चाहिएंए खंडित पत्र कभी न चढ़ाएं। चावल सफेद रंग के साबुत होने चाहिएं ,टूटे हुए चावलों का पूजा में निषेध है। फूल बासी एवं मुरझाए हुए न हों।
विभिन्न सामग्री से बने शिवलिंग का अलग महत्व
    फूलों से बने शिवलिंग पूजन से भू- संपत्ति प्राप्त होती है। अनाज से निर्मित शिवलिंग स्वास्थ्य एवं संतान प्रदायक है। गुड़ व अन्न मिश्रित  शिवलिंग पूजन से कृषि संबंधित समस्याएं दूर रहती हैं। चांदी से निर्मित शिवलिंग धन- धान्य  बढ़ाता है। स्फटिक के वाले से अभीष्ट फल प्राप्ति होती है। पारद शिवलिंग अत्यंत महत्वपूर्ण है जो सर्व कामप्रद, मोक्षप्रद, शिवस्वरुप बनाने वाला, समसत पापों का नाश करने वाला माना गया है।

-मदन गुप्ता सपाटू , ज्योतिषविद् , चंडीगढ़ ,मो0 98156-19620


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