10/11/2020    दीपावली, अपने भीतर ईश्वरीय प्रकाश के दीये प्रज्वलित कर, ध्यान साधना करें - श्री आशुतोष महाराज जी
सम्पूर्ण भारत प्रत्येक वर्ष दीपावली पर्व को बेहद हर्षोल्लास से मनाता है। कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक यानी धनतेरस से भाई दूज तक का यह मंगलमय सफर स्वयं में पाँच पर्वों को समाए हुए है। as

‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधकार से प्रकाश की ओर’ की उपनिषदीय प्रार्थना को यह पर्व जीवंत करता है। भारतीय संस्कृति के अनुसार पर्व का एक अर्थ ‘सीढ़ी’ भी कहा गया है। मानव जीवन सही मायनों में उत्कर्ष की सीढ़ी कैसे चढ़े, यही संदेश देते हैं ये पर्व!
धनतेरस (कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी)
कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस मनाया जाता है। समुद्र मंथन की पौराणिक कथा के अनुसार इसी दिन भगवान धन्वंतरी अमृत कलश लेकर समुद्र से बाहर प्रकट हुए थे। इसलिए ही इस दिन को ‘धन्वंतरी त्रयोदशी’ भी कहते हैं। भगवान धन्वंतरी सृष्टि के प्रथम चिकित्सक व आयुर्वेद जगत के पुरोधा माने गए हैं। अतः इस दिन आयुर्वेदिक वैद्य विशेष तौर पर रोगियों को प्रसाद रूप में नीम की पत्तियों का नैवेद्य देते हैं। प्रत्येक दिन 5-6 नीम की पत्तियों का सेवन बेहद स्वास्थ्यवर्धक है। रोगमुक्त करने की अतुलनीय क्षमता रखता है। एक तरह से नीम अमृत समान ही है। धनतेरस पर नए बर्तनों और चाँदी के सिक्कों को खरीदने का भी विशेष प्रावधान है। ऐसा माना जाता है, ‘त्रयोदशी’ के दिन सिक्के या धातु निर्मित बर्तन खरीदने से तेरह गुणा मुनाफा होता है। धन्वंतरी जी के हाथों में अमृत युक्त धातु का कलश होने के कारण इस दिन नए बर्तनों को खरीदने की प्रथा कायम हुई। इसके पीछे प्रतीकात्मक भाव यही है कि हम अपने जीवन रूपी पात्र या कलश को इस प्रकार तैयार करें कि वह अमृत से युक्त हो सके। इसी तरह चाँदी के सिक्के ‘चन्द्रमा’ के द्योतक हैं, जो मन में शीतलता और जीवन में संतोष धन के प्रतीक हैं। इस दिन खासतौर पर लोग धन को सद्कार्यों में लगाते हैं, ताकि दो दिन बाद, दिवाली के दिन, उनके घरों में देवी लक्ष्मी का आगमन हो सके। 
धनतेरस के संबंध में एक लोक कथा भी प्रचलित है। राजा हिम के पुत्र की जन्म-कुण्डली के अनुसार उसकी मृत्यु उसके विवाह के चार दिन बाद ही सर्प-दंश से होनी निश्चित थी। पर उसकी पत्नी ने इस निश्चित मृत्यु को विफल करने का कठोर संकल्प लिया। उसने चौथी रात को अपने पति के कक्ष के द्वार पर सोने-चाँदी के सिक्कों का ढेर लगा दिया और अपने पति के चारों ओर दीप जला दिए। फिर सारी रात दोनों ने जागकर काटी। कहा जाता है, तय समय पर सर्प रूप में यमराज हिम के पुत्र के प्राण लेने के लिए उसके द्वार पर पहुँचे। पर सोने के अंबार को चौखट पर देख और हिम के पुत्र को दीपों के प्रकाश के बीच जागृत देख, वे इतने प्रसन्न हुए कि उसके प्राण हरे बिना ही चले गए। इसलिए ही इस दिन यम देवता के नाम पर दीए जलाए जाते हैं और यह दिन ‘यमदीपदान’ नाम से भी प्रचलित है। इस कथा के पीछे गहरा आध्यात्मिक रहस्य है। हम सभी इस अटल सत्य से परिचित हैं कि चौथी रात को यानी चार अवस्थाओं (शैशवावस्था, बालपन, युवावस्था, वृद्धावस्था) के बीतने पर, हम सभी के द्वार पर यमदूत ने दस्तक देनी है। परन्तु यदि हम मृत्यु की पीड़ा से बचना चाहते हैं, तो एक ही युक्ति है जो इस कथा में वर्णित है। सोने-चाँदी को द्वार पर रख दें यानी अपने आंतरिक घर से माया (विषय-विकार-वासना) को निकालकर बाहर कर दें। साथ ही, ईश्वरीय प्रकाश के दीये अपने भीतर प्रज्वलित करें। पूरी रात जागकर यानी साधना करते हुए जागृत अवस्था में जीवन व्यतीत करें। पर यह तभी संभव है, जब हम पूर्ण गुरु की शरणागत होकर ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करेंगे। यही संदेश देता है, धनतेरस का यह पावन पर्व!
दिवाली (कार्तिक अमावस्या)
हम सभी जानते हैं कि अमावस्या की अंधेरी रात को हर्षोल्लास से भरा दिवाली पर्व मनाया जाता है, क्योंकि इस दिन प्रभु राम आसुरी शक्तियों का वध करके अयोध्या लौटे थे। सांकेतिक अर्थ यही है कि जीवन की दुःख भरी काली रात्रि में जब ईश्वर का पदार्पण हो जाता है, तो हर अशुभ घड़ी शुभ में परिवर्तित हो जाती है। 
दीपावली का यह दिन अन्य अनेक शुभ कारणों को भी लिए हुए है-
इस दिन न केवल प्रभु राम रावण का वध कर अयोध्या लौटे थे, अपितु इसी दिन तेरह साल बाद पाण्डवों का हस्तिनापुर लौटना हुआ था।
भगवान विष्णु ने नरसिंह रूप धारण कर इसी दिन हिरण्यकशिपु का वध किया था।
इसी दिन उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ था।
जैन धर्म में इस दिन को ही महावीर जी के मोक्ष दिवस के रूप में मनाया जाता है।
इस दिन ही सिक्खों के छठे गुरु श्री हरगोबिन्द सिंह जी 52 अन्य राजाओं सहित कारागार से मुक्त हुए थे। इस कारण से सिक्ख भाई-बहन इस दिन को बंदी छोड़ दिवस के रूप में धूमधाम से मनाते हैं।
स्वामी रामतीर्थ जी का जन्म व महाप्रयाण दोनों इसी दिन हुए थे।
इसी दिन आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती जी का निर्वाण हुआ था।
कठोपनिषद में नचिकेता का प्रसंग वर्णित है। उसके अनुसार बालक नचिकेता ने यमाचार्य के समक्ष आत्मज्ञान की जिज्ञासा रखी। यमाचार्य ने उसे ब्रह्मज्ञान प्रदान कर उसकी इस जिज्ञासा का शमन किया। नचिकेता सद्गुरु रूपी यमाचार्य से आत्मज्ञान प्राप्त कर यमलोक से भूलोक लौटा। उसके लौटने की खुशी में सभी नगरवासियों ने पूरे नगर में दीप जलाए। यह पावन घटना भी दीपावली के दिन ही घटी थी। 
दीपावली को मनाने के उपरिलिखित अधिकांश कारणों से एक बात प्रखर रूप में उभर कर आती है। वह यह कि यह दिन मांगलिक इसलिए है क्योंकि इस दिन एक साधक को सद्गुरु की कृपा से ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है। फलतः उसके अंतर्घट में ईश्वर का पदार्पण होता है। ईश्वर के अलौकिक प्रकाश का दर्शन कर उसके दुःख रूपी सघन अंधकार का अंत होता है। चिंताओं के वन में जो लम्बे काल से वह वनवास भोग रहा था, उसका अंत होता है। अतः वह अथाह आनंद का अनुभव करता है। यदि वह दृढ़ता से सद्गुरु प्रदत्त ज्ञान पर चले, तो फिर यही दिन उसके निर्वाण, मुक्ति या मोक्ष का आधार तक बन जाता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इसी दिन समुद्र मंथन से श्री लक्ष्मी जी प्रकट हुई थीं। इसलिए विशेष तौर पर इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है, ताकि हर घर में लक्ष्मी जी का वास हो। हमारे ज्ञानी-पूर्वजों के अनुसार केवल लक्ष्मी जी जीवन में मंगल नहीं ला सकतीं। इसलिए उनके साथ श्री गणेश और सरस्वती जी की पूजा का भी प्रावधान रखा गया। श्री गणेश विवेक के द्योतक हैं। उनकी पूजा कर हम प्रार्थना करते हैं कि वे हमारी बुद्धि को प्रकाशित कर धन को सद्कार्यों में लगाने के लिए प्रेरित करें। वहीं हंसवाहिनी और ज्ञानदायिनी माँ सरस्वती के पूजन द्वारा हम अपने मन को शुभ्र व पुनीत करने का संकल्प लेते हैं। उड़ीसा व बंगाल में इस दिन माँ काली की पूजा भी की जाती है। माँ काली शक्ति का प्रतीक हैं, जिन्होंने सदैव आसुरी शक्तियों का विनाश कर भद्र पुरुषों का उद्धार किया। ठीक इसी तरह से धन के आने पर मद में चूर हो हम धन का दुरुपयोग न करें, अपनी शक्ति का सदुपयोग करें, यही प्रेरणा माँ काली हमें देती हैं। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।


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