22/04/2016  उर्मि की कलम से..... " हकीकत"
एक राही जीवन राह में अवतीर्ण हुआ 
सड़क का हर रास्ता जहां में परिवर्तित हुआ ।

सुरम्य वितान वसित थे जहाँ कभी 
वहाँ टूटी झोपड़ियों के टाट लटक रहे थे अभी ।

नंगे बच्चे भूख से बिलख रहे
माँ की ममता के शोले थे दहक रहे ।

व्याकुलता हिय की बरबस मुँह पर आकर रूक जाती 
भूखमरी नग्न ताण्ड़व में मदमस्त हो रम जाती ।

अकस्मात चक्षुओं से अश्रुधारा बह जाती 
मानव की वह करूण व्यथा भाव मुखरित हो जाती ।

माँओं का सुहाग मदहोशित था मधुशाला में 
अपने अरमानो को समर्पित कर रहीं थी ज्वाला में ।

दहकते थे अंगारे शोले से थे भड़क रहे 
पति पीड़न से दुख दर्द के घन घनघोर कड़क रहे ।

सँकरी झुग्गी झोंपड़ियाँ थी अस्त -व्यस्त 
तेज धूप से घर के लोग सभी थे त्रस्त ।

भीषण गर्मी से बदन धूप से था नहा रहा 
लू के थपेड़ों से शरीर को झुलसाते हुए जा रहा ।

दलदल कीचड़ का था साम्राज्य व्याप्त 
एक -एक बून्द नीर हेतु इंसा थे अतृप्त ।

रोटी की थी बनी हुई मुमुषा 
कराल मरघट न बने यह थी आकांक्षा ।

कुटिल मानव,विकराल चाले 
सच्चाई के मुँह पर पड़े हुए हैं ताले ।

वसन जर -जर हो गए झाँक रहा उसमें बदन 
चीख -चीख कहता भ्रष्टाचार ने हमारा किया यह हश्न ।

आवाम की गूँज चीख-चीख कह रही 
बेईमानों को अफसर शाही की सह रही ।

चारों और महामारी का फैला हुआ है प्रकोप 
हर शख्स के मस्तक बेईमानी का लगा हुआ है आरोप ।

टूट गया खुशहाल भारत का यह स्वप्न
हृदय विदारक ध्वनि का पल-पल हो रहा श्रवण।

प्रदूषण फैला हुआ था प्रदूषित वायु 
दमघोटू इस जहर से इंसा की घटती आयु।

कराल काल सा मुँह फैलाए खड़ा दाये बाये 
आधुनिक सर्प 
भुखमरी आतंक हिंसा का जहर उगलता यह नृप। भाई-भाई की निगाहें तनी हुई 
खून की प्यास सी बनी हुई ।।

तव्वसुर खो गया पुहुप का 
मर गया अस्तित्व उस भ्रमर का ।

वृक्षों से आच्छादित थे जो कभी उपवन 
मदहोशित करते थे जहां को यह मधुवन ।

सुरपुर में पदासीन थे कभी सुमन 
सुरमणी अप्सरा सा प्रतीत होता था भुवन ।

ढ़ह गया वो सौन्दर्य उस रमणी का 
बिछड़ गया साहिल उस तरणी का ।

नीरवता सन्नाटा चीर रहा जहन को 
कलुषित कलह ध्वस्त कर रहा तन मन को ।

विलुप्त खेत खलिहान ,नद पर अवतीर्ण हुए आवास 
इस सभ्यता ने संयुक्त परिवार को दे दिया वनवास ।

इस युग में मानव मूल्य बन पड़े जंजाल 
मानवता को प्रतिष्ठित करे नहीं किसी की मजाल ।

जमाखोरी ने लुट लिया सुकून 
पत्थर में वसित रह गया ईश्वर सगुण ।

पूरित थे कभी निर्झर प्यार नीर से 
जहां कायल था प्यार तीर से । 

रह गया निर्झर बस अब चट्टान धीर 
वातायन के झोंके बैचेन हो देख रहे अधीर ।

भव्य नगर बुनियाद खोखली 
पापी जनता हैं मोखली ।

बन्द डिब्बों में बू आती अब मिलावट की 
अमीरो में फैल रही बीमारियाँ सब्जियों के तरावट की ।

केलि करते थे तन्मय तलीन हो कभी खग 
गमों को भूलकर प्रफुल्लित होता कभी जग ।

भोर की प्रथम किरण बनें हुए थे जीवन में 
देख दारूण दशा नीर उमड़-घुमड़ रहे थे नयनों में ।

पलभर का जीवन कुसुम का बना हुआ था
अमरफल 
उसके आगमन पर उषा ढुलाती थी कभी चँवर ।

सुरभि श्मशान की दुगन्ध सी बनी हुई 
मेरे उक्त कथन पर इंसा की भौंहें मुझ पर तनी हुई ।

जर-जर जरित होती यह अवस्था
बिगड़ गई भारत की सम्पूर्ण व्यवस्था ।।

उर्मिला फुलवारिया
पाली-मारवाड़ (राजस्थान)
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