26/07/2017  रामनाथ कोविंद के शपथ समारोह में जय श्रीराम के नारे ने फिर खोली बीजेपी की कलई
नवनिर्वाचित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के शपथ समारोह को देख रहा था, तभी बीजेपी के दलित चेहरा रहे बंगारू लक्ष्मण की याद आ गई. एक मीडिया हाउस के स्टिंग ऑपरेशन में फंसने के बाद लक्ष्मण को पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा था. इसके साथ ही उनके राजनीतिक कॅरियर पर विराम लग गया था. लक्ष्मण पर पार्टी ने किसी भी तरह की सहानुभूति दिखाने से इनकार कर दिया था. बीजेपी अध्यक्ष बनने वाले वह पहले दलित नेता थे. वह ऐसे समुदाय से आते थे, जो हमेशा से ही हाशिए पर रहा और उत्पीड़न का शिकार रहा. उनका बीजेपी अध्यक्ष बनना भी अप्रत्याशित था. हकीकत यह है कि उनकी बीजेपी अध्यक्ष पद पर नियुक्ति राजनीतिक फायदे के लिए की गई थी. हालांकि लक्ष्मण को पद से हटाने के पीछे वजह थी, लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई के दौरान जाति फैक्टर को नजरअंदाज नहीं किया जा सका. अब यह सवाल उठना लाजमी है कि बीजेपी के लिए कोविंद को राष्ट्रपति बनाया जाना क्या मायने रखता है?
सेंट्रल हाल में जय श्रीराम के नारे लगाने की परीक्षा सिर्फ उसी वक्त होगी, जब हिंदू धर्म से इतर अन्य धर्म से जुड़े नारे लगाए जाएंगे. यह सवाल उठ रहा है कि क्या तब बीजेपी ऐसे नारों का स्वागत करेगी? यह बीजेपी के लिए खुशी का दिन है और उसने अपनी खुशी को व्यक्त किया है. बंगारू लक्ष्मण से लेकर कोविंद के राष्ट्रपति बनने तक बीजेपी ने दलितों को खुश करने की पूरी कोशिश की. हालांकि रोहित वेमुला, ऊना घटना और फरीदाबाद घटना के बाद जनरल वीके सिंह का बयान बीजेपी के दोहरे चेहरे को उजागर करते हैं. भीड़ की ओर से दलितों की हत्या समेत कई घटनाएं बीजेपी के वोटबैंक की राजनीति के पुलिंदा को खोलते हैं.
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