29/04/2018  एक गीतिका, रोशनी के शहर से. संजीव जैन
रोशनी  के  शहर  में,  हैं  अन्धेरे   इस  क़दर/
जाने किसको खोजता है,आदमी है दर-बदर//

तेरे सच की,मेरे सच की, सच में कैसी दूरियां/
जानता  कोई  नही, सच  में है सच ये किधर//

ज़िन्दगी  की  खोज  में  ही, दौड़ती है जिंदगी/
जिंदगी  से  पूछती  है, ज़िन्दगी  तू  है किधर//

प्यार  के एतबार पर,प्यार पल पल लुट रहा/
प्यार पागल प्यार में,पर प्यार जाने है किधर//

आदमी  बस  आदमी से, डर रहा है अब यहाँ/
आदमी की भीड़ में  भी,आदमी  पर है किधर//

ले  तरक़्क़ी  की  किताबें, चल रहा है आदमी/
ये  किताबें  पूछती  है, पर तरक़्क़ी है  किधर//

आदमी   की  जंग क़ुदरत से,कहाँ ले जायेगी/
गर ज़मीं ही ना रही, तो  आदमी होगा किधर//

इस  भटकते  दौर से वक्त कर रहा कैसे दगा/
वक्त  को  ही वक्त की, जैसे  नहीं कोई क़दर//
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