अन्तरराष्ट्रीय (06/02/2019) 
आज समाज पुन: अपनी संस्कृति की ओर बढ़ें और गो रक्षण कर प्रकृति को प्रदूषण मुक्त करें – साध्वी पद्महस्ता भारती

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा कुंभ मेला, प्रयागराज में चल रही गोकथा के पहले दिवस में गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या कथा व्यास साध्वी पद्महस्ता भारती जी ने बताया कि अनादि काल से हमारे शास्त्र-ग्रंथों में गाय को अघ्न्या कहकर यह दर्शाया गया कि गाय अवध्य है। वह पूजा करने योग्य है। हमारे भारत के आर्ष ऋषि व संत अंधविश्वासी नहीं बल्कि परम वैज्ञानिक थे। उन्होंने जो भी कार्य किया उसके पीछे वैज्ञानिक कारण निहित रहे। उन्होंने गाय का रक्षण इसलिए किया क्योंकि गाय हमारे स्वास्थ्य के साथ-साथ हमारे पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त रखने का भी आधार है। हमारे ऋषियों के आश्रम का आकाश सदा यज्ञ धूम्र से आच्छादित रहता था। यज्ञ उनकी दैनिक दिनचर्या का अंग थे। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि यज्ञ का आधार गाय थी। गाय के घी से किए गए यज्ञों का धूम्र्र अनेकों प्रकार के रोगों की दवा है। आज अनेकों वैज्ञानिक भी गाय के घी से होने वाले हवन यज्ञों के धूँए पर शोध कर इस बात को प्रमाणित कर रहे हैं कि यज्ञ धूम्र एक प्रकार के इन्जैक्शन का कार्य करता हैजो कई रोंगों को खत्म करने में सहायक है। केवल रोगों को ही नहीं यह धूम्र तो प्रकृति को भी प्रदूषण मुक्त करने में सहायक है।

            ऋषियों ने गाय को संरक्षण दिया क्योंकि गाय हमें हमारी प्राण वायु देती है। वह अपनी श्वांस से सदा ऑक्सीजन का विसर्जन करती है। गाय के शरीर से गूगल की गंध प्रवाहित होती है जो वातावरण को प्रदूषण से मुक्त करती है। गाय के गोबर का यदि उचित ढंग से प्रयोग किया जाए तो जिस ईंधन के लिए हम कितने वृक्षों को काटते हैं वही ईंधन गाय के गोबर से प्राप्त कर वृक्षों को कटने से बचाया जा सकता है। रूस के वैज्ञानिक शिरोविच के द्वारा किए गए शोध बताते हैं कि गाय के गोबर के लेपन से रोडियो विकिरणों के दुष्प्रभाव से बचने के साथ-साथ यदि इसका घरों की छतों पर लेपन किया जाए तो बिजली के दुष्प्रभाव से भी घरों की सुरक्षा की जा सकती है। गोबर में ऐंटीसेपटिक तत्त्व पाये जाते हैं। पुराने समय में रसोई में गोबर का लेपन किया जाता था। गोबर के लेपन के कारण किसी भी प्रकार का कोई कीटाणु रसोई घर में प्रवेश नहीं कर पाताक्योंकि गाय माता का गोबर कीटाणु विनाशक है। भारतीय देसी गाय की इस अनंत महिमा को अब तो विदेशी लोग भी समझने लगे हैंइसीलिए तो विदेशों में भारतीय गाय के दुग्धघृतगोमूत्र इत्यादि की मांग बढ़ रही है।

            साध्वी जी ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि विडंबना की बात है कि जहां आज दूसरे देशों के लोग हमारी गाय की महिमा को समझ चुके हैं वही हम भारतवासी अभी तक सोए हुए हैं। आज भारतीय लोग तो अपनी संस्कृति से विलग होते चले जा रहे हैं। भारत में अब गो पूजन कमगो हत्या अधिक हो रही है। पहले भोजन करने से पूर्व प्रथम निवाला गाय के लिए गोग्रास के रूप में निकाला जाता था लेकिन अब तो बहुत सारे लोग गोग्रास के अर्थ को ही भूल गए। हम याज्ञिक संस्कृति को भी भूलते चले जा रहे हैं। कहाँ पहले यज्ञ-हवन के शुद्ध धूम्र से प्रकृति माँ को प्रसन्न रखा जाता था वहीं आज कहीं पर फैक्टरियों से उठता विषाक्त धूम्र,कहीं मोटर गाडियों का धूम्र तो कहीं खेतों से उठता हानिकारक धूम्र प्रकृति को रूद्ररूप धारण करने पर विवश कर देता है। संस्कृति को भूलने के कारण ही मानव समाज आज अनेकों प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है। इसलिए समाधान यही है कि हम पुनः अपनी संस्कृति की तरफ बढ़ें और गो रक्षण कर प्रकृति को प्रदूषण मुक्त करें। लेकिन सर्व श्री आशुतोष महाराज जी कहते हैं कि बाह्य प्रदूषण तब तक समाप्त नहीं हो सकता जब तक मानव के भीतर का प्रदूषण समाप्त नहीं होगा। इसलिए सर्वप्रथम मन को प्रदूषण मुक्त करना होगा। जैसे बाहरी प्रदूषण को खत्म करने की विधि यज्ञ है वैसे ही आंतरिक प्रदूषण को खत्म करने की विधि ज्ञान यज्ञ है। ब्रह्मज्ञान के माध्यम से मानव का मन निश्चल व शुद्ध विचारों वाला होता है और शुद्ध व सुंदर विचार ही सुंदर संसार का आधार हैं। 

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