राष्ट्रीय (01/07/2019) 
क्या आपकी कुंडली आपका रोग डाक्टर से भी पहले बता सकती है ?

भले ही आज मेडीकल साईंस कैंसर जैसे रोग का डायग्नोज करके उसका निदान कर रही हेै परंतु इस रोग का पता उसके होने के बाद ही डाक्ठर बता सकता है, अधिक पहले नहीं। कई बार तो कैंसर चौथी स्टेज पर पहुंच जाता है तब टैस्टों से पता चलता है। हार्ट अटैक चुपके से हो जाता है। परंतु ज्योतिष विज्ञान की विशेषता यह है कि  जब मनुष्य इस संसार में आता हैे तो जीवन का सारा लेखा जोखा उसकी जन्मपत्री बता देती हेै कि इस व्यक्ति की शिक्षा क्या होगी, विवाह कब होगा, संतान क्या होगी, व्यवसाय क्या होगा, दुर्घटना कब होगी , रोग क्या होगा, आयु कितनी है,मृत्यु केैसे होगी ..... आदि आदि ।


इस लेखक के दादा जी स्वयं ज्योतिषी थे , जिनकी बनाई कुंडली में सपष्ट लिखा था  कि यह जातक 50 वर्ष की आयु में मेरा व्यवसाय संभालेगा , 57 साल में पत्नी वियोग होगा, 64 वें वर्ष में हृदयघात होगा, 75 साल पूरे नहीं हो पाएंगे। पहली भविष्यवाणियां, अक्षरक्षः सत्य रहीं जबकि अंतिम अभी फलित होने में समय है। 

आज हम अपने पाठकों को रोग के योग से परिचित करवा रहे हें ताकि उन्हें समय रहते सचेत होना चाहिए। हालांकि ज्योतिषीय गणना इतनी आसान नहीं हैें जितनी लगती हैं , फिर भी हम मुख्य बिंदुओं की चर्चा करेंगे। रोग देखने के लिए आपको अपनी  चंद्र राशि, नक्षत्र, लग्न ,कुंडली के भाव, दशा, गोचर, त्रिशांश कुंडली ,ग्रहों के कारकतत्वों आदि का सामान्य ज्ञान होना आवश्यक है।

जन्मांग के 12 भाव या घर शरीर के विभिन्न भागों को दर्शाते हैं। यदि इन भावों में क्रूर ग्रह बेैठे हों या उनकी दृष्टि हो या परस्पर विरोधी ग्रह, विरोधी राशियों में हों तो शरीर के उस भाग में उससे संबधित रोग की आशंका रहती हेै। रोग कब होगा यह दशा , गोचर, साढ़ेसाती , शनि के ढय््ये आदि पर निर्भर करेगा।


चिकित्सा ज्योतिष के प्रसंग में कुंडली के भावों के कारकत्व का विचार करना अब संगत होगा.

प्रथम भाव : सिरमस्तिष्कसामान्यता: शरीरबालरूपत्वचानिद्रारोग से छुटकाराआयुबुढापा तथा कार्य करने की योग्यता.

द्वितीय भाव : चेहराआँखें (दायी आंख)दांतजिव्हामुखमुख के भीतरी भागनाकवाणीनाखूनमन की स्थिरता.

तृतीय भाव : कान (दायाँ कान),  गलागर्दनकंधेभुजाएंश्वसन प्रणालीभोजन नलिकाहंसियाअंगुष्ठ से प्रथम अंगुली तक का भागस्वप्नमानसिक अस्थिरता,शारीरिक स्वस्थता तथा विकास.

चतुर्थ भाव : छाती (वक्ष स्थल )फेफड़ेह्रदय (एक मतानुसार)स्तनवक्ष स्थल की रक्त वाहिनियाँडायफ्राम.

पंचम भाव : ह्रदयउपरी उदर तथा उसके अवयव जैसे अमाशययकृतपित्त की थैलीतिल्लीअग्नाशयपक्वाशयमनविचारगर्भावस्थानाभि.

छठा भाव : छोटी आंत,  आन्त्रपेशीअपेंडिक्सबड़ी आंत का कुछ भागगुर्दाऊपरी मूत्र प्रणाली व्याधिअस्वस्थताघावमानसिक पीड़ापागलपनकफ जनित रोग,क्षयरोगगिल्टियाँछाले वाले रोगनेत्र रोगविषअमाशयी नासूर.

सप्तम भाव : बड़ी आंत तथा मलाशयनिचला मूत्र क्षेत्रगर्भाशयअंडाश,  मूत्रनली.

अष्टम भाव : बाहरी जननांगपेरिनियमगुदा द्वारचेहरे के कष्टदीर्घकालिक या असाध्य रोगआयुतीव्र मानसिक वेदना.

नवम भाव : कूल्हाजांघ की रक्त वाहिनियाँपोषण.

दशम भाव : घुटने घुटने के जोड़ का पिछ्ला रिक्त भाग.

एकादश भाव: टांगें बायाँ कानवैकल्पिक रोग स्थानआरोग्य प्राप्ति.

द्वादश भाव : पैरबांयी आंखनिद्रा में बाधामानसिक असंतुलनशारीरिक  व्याधियांअस्पताल में भर्ती  होनादोषपूर्ण अंगमृत्यु.

जानें आपकी राशि में लिखा है कौ-सा रोग ?

1. मेष  :- इस राशि का स्वामी मंगल है। यह सिर या मस्तिष्क की कारक है और इसके कारक ग्रह मंगल  गुरू हैं।  लग्न में यह राशि स्थित हो तथा मंगल नीच के हो या बुरे ग्रहों की इस पर दृष्टि हो तो ऎसाजातक उच्चा रक्तचाप का रोगी होगा। आजीवन छोटी-मोटी चोटों का सामना करता रहेगा। सीने में दर्द की शिकायत रहती है और ऎसे जातक के मन में हमेशा इस बात की शंका रहती है कि मुझे कोई जहरीला जानवर ना काट ले। परिणाम यह होता है किऎसे जातक का आत्म विश्वास कमजोर हो जाता है और उसकी शारीरिक शक्ति क्षीण हो जाती है जो अनावश्यक रूप से विविध प्रकार की मानसिक बीमारियों का कारण होती है

2. वृषभ :- इस राशि का स्वामी शुक्र है। यह मुख की कारक राशि है  लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह शुक्रबुध और शनि होते हैं।  ऎसे जातक को मुख संबंधी बीमारीछालेतुतलाकर बोलना दि की शिकायत रहती है तथा जातक की संतान को आजीवन बुरे स्वास्थ्य का सामना करना प़डता है।

 3. मिथुन :- मिथुन राशि का स्वामी बुध है। यह वक्षछातीभुजाएं  श्वास नली की कारक है। ग्न मेे स्थित होने पर इसके कारक ग्रह शुक्रबुध  चन्द्रमा होते हैं।  यदि बुध कुण्डली में नीच का हो या अन्य क्रूर ग्रहों से पीç़डत हो तोजातक फेफ़डों से संबंधित रोग जैसे टी.बी., श्वा नली में खराबीवायु प्रकोप (गैस  अपच), जी घबरानाहाथ  माँ पेशियों पर विपरीत प्रभाव प़्ाडता है।

 4. कर्क  :-कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा है। यह राशि ह्वदय की कारक है। इस राशि के लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह चन्द्रमा और मंगल होते हैं। जातक की त्वचा  पाचन संस्थान  विपरीत प्रभाव रहता है एवं जातक मेंआत्म विश्वास की कमी रहती है। मानसिक अवसादकुण्ठा  जातक कमजोर दिल का होता है। ऎसे जातक की संतान भी नीच विचारों की होती है।

 5. सिंह :

सिंह राशि का स्वामी सूर्य है जो नक्षत्र-मण्डल का स्वामी है।  राशि गर्भ  पेट की कारक है। इस राशि के लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह सूर्य और मंगल होते हैं। 10 अंश पर मेष राशि में ये परम उच्च के तथा तुला राशि मेंपरम नीच के होते हैं। सूर्य उग्र स्वभाव केअगितत् तथा इनका रंग हल्का लाल  पीला है। यदि कुण्डली के लग्न में सिंह राशि है तथा यह या सूर्य नीच के हो या अन्यथा किसी प्रका पीड़ित हो तो शरीर में रक्त संचार एवं जीवनी शक्ति प्रभावित होतीहै। जातक को ह्वदयाघातहडि्डयों की बीमारी  नेत्र रोगों से ग्रसित हो सकता है। 

 6. कन्या  :-

कन्याराशि के स्वामी बुध है तथा यह पेट  कमर के कारक हैं। इस राशि के लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह बुध तथा शुक्र होते हैं। नीच का या अन्यथा बुध पीड़ित

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