राष्ट्रीय (03/08/2019) 
नाग पंचमी 5 अगस्त को

मदन गुप्ता सपाटू ,ज्योतिर्विद्चंडीगढ़

इस बार नाग पंचमी पूरे 125 सालों बाद सावन के तीसरे सोमवार (पांच अगस्त) के दिन पड़ रही है ,जिसके कारण इस पर्व का फल दोगुना हो जाएगा। सोमवार और नागपंचमी दोनों ही दिन भगवान शिव की आराधना की जाती है। इसलिए इस बार नागपंचमी का विशेष महत्व होगा। 

नागपंचमी के दिन चंद्र प्रधान हस्त नक्षत्र और त्रियोग का संयोग भी बन रहा है। सर्वार्थ सिद्धि योगसिद्धि योग और रवि योग यानी त्रियोग के संयोग में काल सर्प दोष निवारण के लिए पूजा करना फलदायी होता है।

सावन शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागदेव के पूजन करने की परंपरा है। इसलिये अगर आप भी शिव जी के साथ साथ नाग देवता की भी कृपा पाना चाहते हैं तो इस शुभ मुहूर्त में उन्‍हें दूध पिलाएं और पूजा करें। 


 शुभ मुहूर्त


4 अगस्त को पंचमी तिथि शाम 6.49 बजे शुरू होगी।

5 अगस्त के दिन नाग पंचमी का शुभ मुहूर्त सुबह 5:49 से 8:28 के बीच पड़ रहा है। जबकि समाप्ति तिथि इसी दिन दोपहर 3:54 तक रहेगी।

 कैसे करें पूजा ?
इस दिन महिलाएं दीवारों पर नाग का चित्र बनाकर दूध से स्नान कराके विभिन्न मंत्रों से पूजा अर्चना करती हैं। इससे पहले शिव जी की पूजा होती है। कालसर्प दोष से पीड़ित लोग इस दिन विशेष पूजन कर इसकी शांति कराते हैं। इस दिन दुग्ध से रुद्राभिषेक कराने से प्रत्येक मनोकामना की पूर्ति होती है। प्रसाद में लावा और दूध बांटते हैं। जिनकी कुंडली राहु से पीड़ित होवो इस दिन रुद्राभिषेक अवश्य करें।

हिंदू धर्म में देवी देवताओं की पूजा उपासना के लिये व्रत व त्यौहार मनाये ही जाते हैं साथ ही देवी-देवताओं के प्रतिकों की पूजा अर्चना करने के साथ साथ उपवास रखने के दिन निर्धारित हैं। नाग पंचमी एक ऐसा ही पर्व है। नाग जहां भगवान शिव के गले के हार हैं। वहीं भगवान विष्णु की शैय्या भी। लोकजीवन में भी लोगों का नागों से गहरा नाता है। इन्हीं कारणों से नाग की देवता के रूप में पूजा की जाती है। सावन मास के आराध्य देव भगवान शिव माने जाते हैं। साथ ही यह समय वर्षा ऋतु का भी होता है जिसमें माना जाता है कि भू गर्भ से नाग निकल कर भू तल पर आ जाते हैं। वह किसी अहित का कारण न बनें इसके लिये भी नाग देवता को प्रसन्न करने के लिये नाग पंचमी की पूजा की जाती है।

नाग पंचमी व्रत व पूजन विधि

1.  इस व्रत के देव आठ नाग माने गए हैं। इस दिन में अनन्तवासुकिपद्ममहापद्मतक्षककुलीरकर्कट और शंख नामक अष्टनागों की पूजा की जाती है।
2.  
चतुर्थी के दिन एक बार भोजन करें तथा पंचमी के दिन उपवास करके शाम को भोजन करना चाहिए।
3.  
पूजा करने के लिए नाग चित्र या मिटटी की सर्प मूर्ति को लकड़ी की चौकी के ऊपर स्थान दिया जाता है। 
4.  
फिर हल्दीरोली (लाल सिंदूर)चावल और फूल चढ़कर नाग देवता की पूजा की जाती है।
5.  
उसके बाद कच्चा दूधघीचीनी मिलाकर लकड़ी के पट्टे पर बैठे सर्प देवता को अर्पित किया जाता है।
6.  
पूजन करने के बाद सर्प देवता की आरती उतारी जाती है।
7.  
सुविधा की दृष्टि से किसी सपेरे को कुछ दक्षिणा देकर यह दूध सर्प को पिला सकते हैं।
8.  
अंत में नाग पंचमी की कथा अवश्य सुननी चाहिए।

नाग पंचमी और श्री कृष्ण का संबंध

नाग पंचमी की पूजा का एक प्रसंग भगवान श्री कृष्ण से जुड़ा हुआ भी बताते हैं। बालकृष्ण जब अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे तो उन्हें मारने के लिये कंस ने कालिया नामक नाग को भेजा। पहले उसने गांव में आतंक मचाया। लोग भयभीत रहने लगे। एक दिन जब श्री कृष्ण अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे तो उनकी गेंद नदी में गिर गई। जब वे उसे लाने के लिये नदी में उतरे तो कालिया ने उन पर आक्रमण कर दिया फिर क्या था कालिया की जान पर बन आई। भगवान श्री कृष्ण से माफी मांगते हुए गांव वालों को हानि न पंहुचाने का वचन दिया और वहां से खिसक लिया। कालिया नाग पर श्री कृष्ण की विजय को भी नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है।


काल सर्प दोष


नाग पंचमी पर नाग देवता की पूजा करने के उपरोक्त धार्मिक और सामाजिक कारण तो हैं ही साथ ही इसके ज्योतिषीय कारण भी हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली में योगों के साथ-साथ दोषों को भी देखा जाता है। कुंडली के दोषों में कालसर्प दोष एक बहुत ही महत्वपूर्ण दोष होता है। काल सर्प दोष भी कई प्रकार का होता है। इस दोष से मुक्ति के लिये भी ज्योतिषाचार्य नाग पंचमी पर नाग देवता की पूजा करने के साथ-साथ दान दक्षिणा का महत्व बताते हैं।


नाग पंचमी पर क्या करें क्या न करें ?

इस दिन भूमि की खुदाई नहीं की जाती। नाग पूजा के लिये नागदेव की तस्वीर या फिर मिट्टी या धातू से बनी प्रतिमा की पूजा की जाती है। दूध,धानखील और दूब चढ़ावे के रूप मे अर्पित की जाती है। सपेरों से किसी नाग को खरीदकर उन्हें मुक्त भी कराया जाता है। जीवित सर्प को दूध पिलाकर भी नागदेवता को प्रसन्न किया जाता है।

नाग पंचमी से जुडी कुछ कथाएं व मान्यताएँ

1.  हिन्दू पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी के पुत्र ऋषि कश्यप की चार पत्नियाँ थी। मान्यता यह है कि उनकी पहली पत्नी से देवतादूसरी पत्नी से गरुड़ और चौथी पत्नी से दैत्य उत्पन्न हुएपरन्तु उनकी जो तीसरी पत्नी कद्रू थीजिनका ताल्लुक नाग वंश से थाउन्होंने नागों को उत्पन्न किया।
2.  
पुराणों के मतानुसार सर्पों के दो प्रकार बताए गए हैं — दिव्य और भौम । दिव्य सर्प वासुकि और तक्षक आदि हैं। इन्हें पृथ्वी का बोझ उठाने वाला और प्रज्ज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी बताया गया है। वे अगर कुपित हो जाएँ तो फुफकार और दृष्टिमात्र से सम्पूर्ण जगत को दग्ध कर सकते हैं। इनके डसने की भी कोई दवा नहीं बताई गई है। परन्तु जो भूमि पर उत्पन्न होने वाले सर्प हैंजिनकी दाढ़ों में विष होता है तथा जो मनुष्य को काटते हैं उनकी संख्या अस्सी बताई गई है।
3.  
अनन्तवासुकितक्षककर्कोटकपद्ममहापदमशंखपाल और कुलिक — इन आठ नागों को सभी नागों में श्रेष्ठ बताया गया है। इन नागों में से दो नाग ब्राह्मणदो क्षत्रियदो वैश्य और दो शूद्र हैं। अनन्त और कुलिक — ब्राह्मणवासुकि और शंखपाल — क्षत्रियतक्षक और महापदम— वैश्यव पदम और कर्कोटक को शुद्र बताया गया है।
4.  
पौराणिक कथानुसार जन्मजेय जो अर्जुन के पौत्र और परीक्षित के पुत्र थेउन्होंने सर्पों से बदला लेने व नाग वंश के विनाश हेतु एक नाग यज्ञ किया क्योंकि उनके पिता राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नामक सर्प के काटने से हुई थी। नागों की रक्षा के लिए इस यज्ञ को ऋषि जरत्कारु के पुत्र आस्तिक मुनि ने रोका था। जिस दिन इस यज्ञ को रोका गया उस दिन श्रावण मास की शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि थी और तक्षक नाग व उसका शेष बचा वंश विनाश से बच गया। मान्यता है कि यहीं से नाग पंचमी पर्व मनाने की परंपरा प्रचलित हुई।

नाग पंचमी महत्व

1.  हिन्दू मान्यताओं के अनुसार सर्पों को पौराणिक काल से ही देवता के रूप में पूजा जाता रहा है। इसलिए नाग पंचमी के दिन नाग पूजन का अत्यधिक महत्व है।
2.  
ऐसी भी मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा करने वाले व्यक्ति को सांप के डसने का भय नहीं होता। 
3.  
ऐसा माना जाता है कि इस दिन सर्पों को दूध से स्नान और पूजन कर दूध से पिलाने से अक्षय-पुण्य की प्राप्ति होती है।
4.  
यह पर्व सपेरों के लिए भी विशेष महत्व का होता है। इस दिन उन्हें सर्पों के निमित्त दूध और पैसे दिए जाते हैं।
5.  
इस दिन घर के प्रवेश द्वार पर नाग चित्र बनाने की भी परम्परा है। मान्यता है कि इससे वह घर नाग-कृपा से सुरक्षित रहता है।

नाग पंचमी से जुड़ी मान्यताएं और भोजन से जुड़े रिवाज

अनन्ततक्षक तथा वासुकि तीनों भाई महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी कद्रु के पुत्र थेजो कि सभी सांपों के जनक माने जाते हैं.

नाग पंचमी के दिन सुबह सुबह स्नान कर साफ-सुथरे कपड़े पहन कर पूजा की जाती है.

इस दिन सेंवई और चावल बनाने का रिवाज है. 

कई जगहों पर नागपंचमी के दिन बासी भोजन लेने का रिवाज है. इसके लिए नागपंचमी से पहली रात को ही खाना बना कर रख लिया जाता है,जिसे नागपंचमी के दिन खाया जाता है. 

नाग पंचमी के दिन दीवार को गेरू से पोता जाता है. दीवार के जिस हिस्से पर गेरू लगाया जाता है उस पर कोयला घिस कर नाग देवता की आकृति बनाने की मान्यता है.

रिवाज है कि सोनेचांदी या लकड़ी की कलम से दरवाजे पर हल्दी या चन्दन से पांच फनों वाले नागदेवता का चित्र बनाया जाना शुभ है.
दीवार पर बने नागदेवताओं की दहीदूर्वाचावलदूर्वासेमईफूल और चंदन से पूजा जाता है. 

इस दिन कई जगहों पर लोग नागों की बॉबी पर दूध चढ़ाते हैं. 

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