राष्ट्रीय (08/01/2020) 
दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक तथ्यात्मक अध्ययन

·           पांच वर्ष में दिल्ली सरकार मात्र 394 नए बेड ही अस्पतालों में लगा सकी है

·           पांच वर्ष में दिल्ली सरकार द्वारा एक भी नया प्राथमिक चिकित्सा केंद्र/डिस्पेंसरी नहीं बनायीं गयी

·           दिल्ली सरकार की एनसीटी की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार दवाइयों कि खरीद के लिए जिम्मेदार Central Procurement एजेंसी प्रभावी और समय पर दवाओं की खरीद में विफल रही है।

·           दिल्ली राज्य सरकार के अनुसारराज्य सरकार द्वारा चलाए जाने वाले डिस्पेंसरीज की कुल संख्या जो वर्ष 2014 में 1398 थी वह गिरकर वर्ष 2017 में 1298 रह गयी है।

·           मैटरनिटी होम्स में जो 2015 में 265 थे वह 2017 में काम हो कर 230 ही रह गए

·           नीति आयोग के स्वास्थ्य सूचकांक स्वस्थ राज्यप्रगतिशील भारत में दिल्ली की गिरती हुई सेहत को साफ देखा जा सकता है,  इस केंद्र शासित राज्यों के सूचकांक में दिल्ली दो पायदान फिसलकर 5वें स्थान पर आ गई है।

·           दिल्ली सरकार के अस्पतालों और डिस्पेंसरीज में होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों पर नजर डाले तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि 2018 में कुल मौतों में से 19.2% मृत्यु सर्कुलर सिस्टम (जिसमें हृदय रोगों भी शामिल है) की वजह से हुई थीं और स्वास रोग कुल मृत्यु का 8.4% था। यह निरंतर खराब वायु गुणवत्ता और दिल्ली में प्रदूषण की समस्या को रेखांकित करता है।

दिल्ली में हेल्थकेयर आम आदमी पार्टी सरकार के प्रचार का मुख्य मुद्दा रहा है। इस पृष्ठभूमि में यह उचित है कि सरकार ने दिल्ली सरकार द्वारा संचालित अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवा को बेहतर बनाने के लिए जो कदम उठाने का दावा किया हैउसके लिए प्रति वह जवाबदेह हो। लोक नीति शोध केंद्र ने आज इस मुद्दे पर एक रिपोर्ट जारी की जिसमें स्वास्थ्य के क्षेत्र में दिल्ली सरकार के प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

 

डॉ. विनय सहस्रबुद्धे (राज्यसभा सदस्यराष्ट्रीय उपाध्यक्ष-भाजपानिदेशक-पीपीआरसी) मिनाक्षी लेखी (सांसद- नई दिल्ली) रमेश बिधूड़ी (सांसददक्षिणी दिल्ली) एवं डॉ. सुमीत भसीन (निदेशक-पीपीआरसी)ने आज 'दिल्ली - वेंटिलेटर पर शहरदिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक तथ्यात्मक अध्ययन'पर एक मोनोग्राफ जारी किया।

डॉ भसीन ने एक PPT के माध्यम से प्रस्तुत कींजिसमें तीन मुख्य विषयों: -इनफ्रास्ट्रक्चरमैनपावर और परिणामों के तहत दिल्ली के स्वास्थ्य क्षेत्र की गंभीर स्थिति का व्यापक अवलोकन किया गया। उन्होंने कहा की इस शोध के माध्यम से पता चलता है कि दिल्ली के स्वास्थ्य सेवा को दो शब्दों में समेटा जा सकता हैपहला बड़-चढ़ के प्रचार-प्रसार और नारे लगाना एवं दिल्ली के लोगो को गुमराह करना।

 

मोहल्ला क्लीनिक पर बोलते हुएडॉ सहस्रबुद्धे ने चिंता व्यक्त की कि मोहल्ला क्लिनिक प्राथमिक हेल्थ केयर केंद्र  विकल्प नहीं हैं और यह प्राथमिक हेल्थकेयर केंद्र के मानकों से मेल खाते हैं। अगर शहरों की बात करें तो मोहल्ला क्लिनिक स्वास्थ्य उप-केंद्रों की तरह हैं। इसके अलावाइन मोहल्ला क्लीनिकों को खोलने की जल्दबाजी से पता चलता है कि दिल्ली सरकार केवल संख्या पर ही केंद्रित हैन कि इन क्लीनिकों द्वारा दी जा रही सेवाओं की गुणवत्ता पर। उन्होंने यह भी कहा कि उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के अनुसारराज्य में सरकारी अस्पताल की स्तिथि दयनीय है:

 

Ø  लेक्चररकीकमी - 66%

Ø  डॉक्टरोंकीकमी - 34%

Ø  पैरामेडिकलस्टाफ (ओटीतकनीशियनलैबतकनीशियनआदि) कीकमी - 29%

Ø  नर्सोंकीकमी - 22%

Ø  प्रशासनिककर्मचारियोंकीकमी - 40%

Ø  श्रमिकोंकीकमी - 38%

 

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