विशेष (03/04/2021) 
आज के युग में दान करे या न करे, दान किसको करें और दान क्या है ? क्या दान से दुआ मिलती है ?- धर्मगुरु डॉ एच एस रावत
 यह सच है कि दान से दुआ मिलती है और दुआ से पुण्य मिलता है और पुण्य से आत्मबल मिलता है आत्मबल से संतोष मिलता है संतोष से शांति मिलती है शांति से चित प्रसन्न होता है चित प्रसन्न होने से शरीर के विकार दूर होते हैं । 

दान किसको करें या न करें यह सबाल आज के युग में बहुत महत्व पूर्ण है ? पहले  दान ब्राह्मण को दिया जाता था क्योंकि ब्राह्मण ही दान का अधिकारी था वो समाज को शिक्षा देता था और उसके बदले लोग ब्राह्मण को दान देते थे तथा ब्राह्मण की आत्म शक्ति इतनी प्रबल होती थी क़ि वो दान के बदले दुआ देता था । उस समय आपने ब्राह्मण को गाय दान दी उसने और उसके परिवार ने खूब  गाय का दूध पीया, खीर खायी और पूरे परिवार ने आपको दुआ दी ।  लेकिन आज के ब्राह्मण की शराब ,तंम्बाकू , मुर्गा व अंडा खाने से आत्म शक्ति क्षीण हो गयी है और न वो शाधना रह गयी न वो जप और तप रह गया है आज वो तपश्वी ब्राह्मण है ही नहीं ।  आज आप ब्राह्मण को गाय दान दे देते हो वो कसाई को बेच देता है । और कुछ दिन बाद वो कामधेनु गाय की हत्या कर दी जाती है । उस पाप के भागी आप होंगे । 

इसलिए गरीब ब्राह्मण, किसी ग्राम का ब्राह्मण  को या किसी भी जाति के गरीब से गरीब को ही दान करना चाहिए ।  भिखारी को कभी भी दान नहीं करना चाहिए ।  इन लोगों की  आत्मा भीख मांग मांग कर इतनी मर चुकी होती है क़ि इनकी कोई दुआ आपको नहीं मिलती है । कोढ़ी , लंगड़ा ,अँधा , काना , बहरा और लूला इनको आप दान करते हो इनकी भी आपको कभी दुआ नहीं मिलती है  क्योंक़ि ये लोग पूर्ण मनुष्य से बहुत ईर्षा व घृणा करते हैं तथा ये लोग पूर्ण रूप व्यवसायी होते हैं । भीख मांग मांग कर इनकी आत्मा मर चुकी होती है । तथा भीख के पैसों यानी आपके दान के पैसों से मुर्गा खाते हैं, अंडा कहते हैं व शराब पीते हैं तथा दुराचार करते हैं । अगर आपके दान से किसी मुर्गे की जान जाती है तो उसका पाप भी दान देने वाले को लगता है । इसलिए जिसकी आत्मा ही मर चुकी है तो उसकी दुआ भी नहीं लगती है ।

अगर आप किसी भी कथाकार को लत्ते कपडे सोना चंडी दान करते हो तो वो भी आपकी दी हुई वस्तुओं को बेच देता है । ये भी दुआ नहीं देता है । इनकी नीयत में खोट होता है । दान लेने की नीयत से इनका आत्म बल क्षीण हो चुका होता है । आज के युग में सबसे अच्छा है किसी भी अमीर- गरीब को भंडारा के रूप में भोजन कराना चाहिए । भोजन व भंडारे का प्रसाद ग्रहण करने बाद मनुष्य दुआ अवश्य देता है ।  प्रसाद व भोजन के बाद कभी भी आत्मा से बद्दुआ नहीं निकलती है, हमेशा दुआ निकलती है । दान हमेशा दान के योग्य पात्र को ही देना चाहिए । 
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