(10/06/2021) 
साधना से व्यक्ति में सकारात्मकता उत्पन्न होने के कारण उसके द्वारा अपने आप सात्त्विक विकल्प चुना जाना !
व्यक्ति यदि निरंतर नकारात्मक स्पंदनों के संपर्क में रहे, तो उस पर अनिष्ट परिणाम होते हैं । इस कारण समाज की हानि होती है और आध्यात्मिक दृष्टि से वातावरण दूषित होता है । अत: हमें आध्यात्मिक स्पंदन और उनका स्वयं के जीवन पर होनेवाला परिणाम, इस विषय पर स्वयं का प्रबोधन करना आवश्यक है ।

साथ ही नियमित साधना करने से स्वयं में सकारात्मकता उत्पन्न होती है, जिससे हम अपनेआप अधिकाधिक सात्त्विक विकल्प चुनते हैं, ऐसा प्रतिपादन ‘महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय’ के शॉन क्लार्क ने किया । वे यॉर्क, यू.के. में आयोजित छठवीं इंटरनेशनल कॉन्फ्रेन्स ऑफ दि इंटरनेशनल नेटवर्क फॉर द स्टडीज ऑफ स्पिरिच्युआलिटी इस वैज्ञानिक परिषद को संबोधित कर रहे थे । इस परिषद का आयोजन इंटरनेशनल नेटवर्क फॉर दी स्टडीज ऑफ स्पिरिच्युआलिटी (INSS) इन असोसिएशन विथ यॉर्क सेंट जॉन यूनिवर्सिटी, यॉर्क, यूके इन संस्थाओं ने किया था । उन्होंने हाऊ बिजनेस और प्रोफेशनल प्रैक्टिस अफेक्ट सोसायटी एट अ स्पिरिच्युल लेवल यह शोधनिबंध प्रस्तुत किया । इस शोधनिबंध के लेखक महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी और सहलेखक विश्‍वविद्यालय के शॉन क्लार्क हैं ।

महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय द्वारा वैज्ञानिक परिषद में प्रस्तुत किया गया 74 वां शोधनिबंध था । इससे पूर्व विश्‍वविद्यालय ने 15 राष्ट्रीय और 58 अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक परिषदों में शोध निबंध प्रस्तुत किए हैं । इनमें से अंतरराष्ट्रीय परिषदों में विश्‍वविद्यालय ने ‘सर्वश्रेष्ठ शोधनिबंध’ पुरस्कार प्राप्त किए हैं ।
शॉन क्लार्क ने आगे कहा किसमाज कल्याण के लिए 70 और 80 के दशक में उद्योगक्षेत्र में  ‘शाश्‍वत विकास’ (Sustainable development) और ‘औद्योगिक सामाजिक दायित्व’ (Corporate Social Responsibility (CSR)) ये महत्त्वपूर्ण आंदोलन हुए । तथापि आज समाज की स्थिति देखें तो सत्तासीन व्यक्तियों के चरित्रभ्रष्टाचारलालचशिक्षा का अभावप्रयत्नों में निरंतरता का अभावएकत्रित प्रयासों का अभाव जैसे सूत्रों के कारण इन आंदलनों की फलनिष्पति अल्प है । आंदोलन आरंभ हुए 50 वर्ष हो गएतो भी आज हम अपने आस-पास देखेंतो विशाल मात्रा में पर्यावरण के अनिष्ट परिवर्तनयुद्ध की आशंका जैसे आपातकाल निर्माण करनेवाले संकट दिखाई देते हैं । इन सभी संकटों को देखकर सभी के मन में प्रश्‍न निर्माण होता है किमानवजाति से क्या त्रुटि हो रही है इसका उत्तर है ‘धर्मपालन का अभाव’ । आदि शंकराचार्यजी ने ‘धर्म’ की जो व्याख्या कि है उसके अनुसार वह निम्न तीन कार्य करता है :

अ. समाजव्यवस्था उतम बनाए रखना

आ. प्रत्येक प्राणिमात्र की ऐहिक उन्नति करना
इ. आध्यात्मिक उन्नति साध्य करना

         वर्तमान स्थिति में औद्योगिक आचारसंहिता के वैचारिक नेतृत्व का ध्यान सूत्र क्र. ‘अ.’ और ‘आ.’ की ओर है; परंतु किसी का भी सूत्र क्र. ‘इ.’ (आध्यात्मिक उन्नति) की ओर ध्यान नहीं है । आध्यात्मिक उन्नति करने के लिए किए जानेवाले प्रयत्नों के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण प्रयत्न अर्थात हमारा जीवन और हम जो करते हैं उसमें सकारात्मकता बढाना और नकारात्मकता अल्प करना ।

         तदुपरांत श्री. क्लार्क ने ‘महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय’ द्वारा ‘यूनिवर्सल ऑरा स्कैनर’ का उपयोग कर किए गए व्यापक शोध में से 2 प्रयोगों के संदर्भ में जानकारी दी ।

        प्रथम प्रयोग परिधान पर था । इस प्रयोग में एक महिला ने निम्न प्रकार के परिधान क्रमशप्रत्येक 30 मिनिट पहने थे । - 1. ‘व्हाईट इविनिंग गाऊन’ (पैरों तक लंबा सफेद चोगा), 2. ‘ब्लैक ट्यूब टॉप ड्रेस’ (‘ऑफ शोल्डर’अर्थात कंधो से खुला काले रंग का पश्‍चिमी परिधान), 3. काला टी-शर्ट और काली पैन्ट, 4. सफेद टी-शर्ट और सफेद पैन्ट, 5. सलवार-कुर्ता, 6. छह गज की साडी और 7. नौ गज की साडी । महिला द्वारा प्रत्येक परिधान पहनने के पूर्व और पश्‍चात उसका ‘यूएएस’ उपकरण द्वारा परीक्षण किया गया । उस महिला द्वारा पहने प्रथम परिधानों से उसकी नकारात्मक ऊर्जा में अत्यधिक वृद्धि हुई थी । तदुपरांत उसके द्वारा पहने परिधानों के कारण उसकी नकारात्मक उर्जा अत्यधिक अल्प हुई । परिधान क्र. 3 और एकसमान थेकेवल रंग का भेद थातब भी महिला द्वारा परिधान क्र. 3 (काले रंग का परिधानपहनने पर परिधान क्र. 4 की तुलना में उसमें अत्यधिक मात्रा में नकारात्मक उर्जा उत्पन्न हुई जो विशेषतापूर्ण है । महिला में सकारात्मक उर्जा केवल अंतिम परिधान पहनने पर दिखाई दी । इस प्रयोग से ध्यान में आता है किपरिधान के प्रकार और रंग का व्यक्ति पर आध्यात्मिक (उर्जा केस्तर पर परिणाम होता हैपरंतु परिधान बनानेवाले प्रतिष्ठान और संबंधित व्यवसायी (फैशन डिजाइनरइससे पूर्णतः अनभिज्ञ है । दूसरे प्रयोग में चार प्रकार के संगीत का व्यक्ति पर होनेवाला परिणाम यूएएस उपकरण की सहायता से जांचा गया ।

        शाश्‍वत विकास और व्यावसायिक सामाजिक दायित्व के भी परे ‘आध्यात्मिक परिणाम’ नाम का एक सूत्र है  और नए उत्पादनों एवं सेवाओं की निर्मिती करते समय उसकी ओर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक हैयह इस शोधनिबंध के माध्यम से सुस्पष्ट किया गया । अंत में श्रीक्लार्क ने कहाउद्योग और उपभोक्ता इन दोनों को इस संदर्भ में बोध होना आवश्यक हैक्योंकि निरंतर नकारात्मक स्पंदनों के संपर्क में रहने से उसका व्यक्ति पर अनिष्ट परिणाम होता है । जिससे समाज की हानि एवं वातावरण में आध्यात्मिक प्रदूषण होता है । इसकी रोकथाम हेतु नियमित साधना करना ही एकमात्र उपाय है ।

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