मनोरंजन (04/06/2021) 
जो ध्यान साधना में आगे बढ़ना चाहते है,
जो ध्यान साधना में आगे बढ़ना चाहते है, 
उनको  *' वो '* और *' मैं '* को समझना जरूरी है।
यहाँ *वो* जो खुद पे विश्वास नहीं रख पाएं और *मैं* जो स्वयं को परमात्मा का अंश मानकर बस उसीके पथ पर आगे बढ़ रहें हैं। 
और मानते है की....
' मैं ' आरम्भ हूं,
' मैं ' ही अंत हूं, 
' मैं ' बस मैं हूं,
क्योंकि ' मैं ' अंतहीन का ही तो अंश हूं।

*वो और मैं*
वो.... अंधविश्वास, मैं.... आत्मविश्वास।

वो पूछते हैं कौन हूं मैं,
मैं कहता हूं 'मैं हूं मैं '।

वो कहते हैं अहंकार है मैं,
मैं कहता हूं ' हूं मैं '।

वो हंसते है मैं पे मेरी,
और उनपे हंसता हूं ' मैं '।

वो भीड़ दिखते है मुझे,
आईने में अकेला दिखता हूं ' मैं '।

वो भेड़ों के झुंड़ में है खड़े,
तो सिंह सा दहाड़ता हूं ' मैं '।

वो बहते नदी बहाव से हैं,
नांव में बड़ता हूं ' मैं '।

वो थककर हौसले छोड़ रहें है,
मंज़िल की ओर चलता हूं ' मैं '।

वो आंख खोल देख रहें हैं लहरों के नज़ारे,
बीच मन की गहराईयों में मैं का मौती ढूंढता हूं ' मैं '।

मैं अहम नहीं हूं ये जान ले ऐ जहां,
ध्येय मैं से ही रोज़ बढ़ता हूं ' मैं '।

मंजिले मिलती है उनको निगाह टिकाते है जो,
इसलिए अंतरमन में मैं को ढूंढता हूं ' मैं '।

मैं निशब्द हूं मैं को पाकर,
निराकार का ही तो अंश ' मैं '।

हुम से अहम, अहम से सोहम, सोहम से शिवोहम,
मैं हूं  ' मैं ',    मैं हूं ' मैं ',    मैं ही तो हू ' मैं '।

'हिताचिंतक विकास'
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