अन्तरराष्ट्रीय (02/11/2021) 
दिवाली सुख शांति समृद्धि की राह रोशन करती है" - ब्रह्मा कुमार सुशांत
दीपावली त्योहारों का राजा  है। पांच दिनों का महापर्व है। यह त्योहार न केबल अनेक देशों व धर्मों में मनाई जाती, अपीतु यह दीपोस्तव पुरे मानवता को सुख शांति समृद्धि की राह दिखाती है। दीवाली मूलतः देने की दैवी प्रवृति का यादगार उत्सव है।

यह सच है, दूसरों को देना ही पाना है। स्थूल चीजों को जितना देगें, उतना कम हो जाएगा। लेकीन सूक्ष्म चीज़ जितना देगें, उतना बढ़ेगा। ज्ञान हो या अज्ञान, खुशी हो या गम, बांटने से बढ़ते हैं। इसलिए सुख, शांति, सदज्ञान, सद्बुद्धि, सद्गुण व सकारात्मक शक्ति देने वालों को देवी देवता कहते हैं। दुःख, अशांति, अज्ञान, अवगुण व नकारात्मक शक्ति फैलाने वाले दैत्य दानव कहलाते हैं।

तभी दीवाली के दिनों में स्वास्थ्य, विद्या, बुद्धि, शुद्धि, सिद्धि, खुशी, धन, संपत्ति व समृद्धि देने वाले धन्वंतरी, श्रीगणेश, सरस्वती, कुबेर व लक्ष्मी आदि देव देवियों का आवाहन व उपासना करते हैं। सायं काल में, घर के अंदर और बाहर दीया जलाकर देवी देवताओं के मार्ग प्रकाशित करते हैं। अकाले मृत्यु से बचने हेतु, धन तेरस पर, मृत्यु के देवता यम राज को दीप दान करते हैं। कहते हैं, 'दे दान तो छूटे ग्रहण'। अर्थात्, ईश्वर को अवगुणों का और जरुरत मंद लोगों को आवश्यक चीज़ों का दान करने से अभाव, संकट या अशुभता दुर हो जाते हैं। दीवाली की दीपदान प्रथा इसी देने की संस्कार को सुदृढ़ करती है।

दिवाली पर, यम देवता को दीप दान करते हैं। इसका भावर्थ है, हमारे मन की अज्ञान अंधकार में छिपे हुए मनोविकार व कमजोरियां ईश्वर को दे देना है। जिससे हमारी आत्म दीपक जग जाती है। जीवन में यम, नियम व संयम बरतने की शक्ति मिलती है। अर्थात्, ईश्वरीय ज्ञान व परमात्म योग द्वारा हम विकार, बुराई, व्यसन, बीमारी व गरीबी की ग्रहण से छूट सकते हैं। अचानक मृत्यू के भय से मुक्त हो सकते हैं। जीवन में सच्ची स्वास्थ्य, सुख शांति समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं।

धन तेरस असल में, धन तेरा करने की उत्सव है। अपनी तन मन धन जन को परमात्मा के तरफ़ 'तेरा तूझको अर्पण, क्या लागे मेरा' करने की अवसर है। कोई भी चीज हम परमात्मा को दे देते हैं, अथवा उनके कार्य में सफ़ल करते हैं, तो वह चीज़ कई गुणा बढ़ कर हमारे पास वापस आ जाता है। ईश्वरीय सेवा व स्मृति में तन और मन को लगाने से हम अधीक स्वस्थ, दीर्घायु व शाक्तिशाली होते हैं। परमात्मा के कार्य में जितना धन और जन जुटाते हैं, अनेक गुणा वापस पाते हैं। जितना ईश्वर अर्थ अर्पण होते हैं, उतना ही जीवन स्वच्छ, साफ़, टिकाऊ व खुशनुमा दर्पण बन जाती है।

दिवाली असल में दिव्यता, शुभता व सकारात्मकता की रूहानी रोशनी फैलाने का पर्व है। दीया उसका सूचक है। दीया का अर्थ है देना। अध्यात्मिक भाषा में आत्म ज्योत जगाने को दीया जगाना कहते हैं। भौतिक शरीर में विद्यमान अंतरात्मा, मिट्टी से बनी दीया के लो समान, ज्योति स्वरूप है। सर्व आत्माओं के रूहानी पिता, परम ज्योत परमात्मा  दिव्य ज्ञान, देवी गुण और दिव्य शक्तियों का शाश्वत स्रोत व सागर है। उस परम ज्योत के साथ योग युक्त रह कर, आत्माओं का रुहानी ज्योत जगाना ही सच्ची दिवाली है।

दीवाली पर नई वस्त्र, वस्तु, वर्तन वा उपहार बांटने के साथ साथ हमे औरों को खुशी, स्नेह, सहयोग, सहानुभुति, उमंग उत्साह, शुभ भावना व शुभ कामना देने की ज्यादा जरूरत है। जिससे हमे सच्ची खुशी, दुआएं, स्वास्थ्य, शुभता व संपर्णता प्राप्त होती है। सोना, चांदी आदि कीमती धातु वा  घरेलू चीज़ों को खरीदने के साथ हमे मानवीय मूल्य, संवेदना, सदभावना व निस्वार्थ सेवा को अपनाना अधीक आवश्यक है।

नरक चतुर्दशी हमे नरकासुर रुपी आसुरी अवगुण व दानवी प्रवृतियों का अंत करने की याद दिलाती है। यह छोटी दीवाली हमे आत्मबोध की ज्योत जगाने, ईश्वरीय स्मृति से अंदर की आसुरी संपदा का विनाश करने तथा दैवी संपदा का विकास करने की प्रेरणा देती है। नर्क तुल्य बन गई जीवन व संसार को स्वर्ग समान बनाने की शिक्षा देती है। काली पुजा भी हमे सभी विकार, रोग शोक, दुःख अशांति व दुर्गती के जड़ भौतिकवाद, भोग वृत्ति व देह अभिमान को समाप्त करने की सन्देश देती है। सही अर्थ में दिवाली हमारे भौतिक अधीनता, असुरीय अवगुण व अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर करने का यादगार पर्व है। यह हमे जड़ मानसिकता से ऊपर उठने, दिव्य चेतना की शीर्ष श्रोत शिव परमात्मा से जुड़ने की रूहानी रोशनी देती है।

दिवाली की गोवर्धन पूजा भी प्राणी जगत की पालक प्रकृति-पर्यावरण को सम्मान देने का सूचक है। क्यों की, निरंतर सेवा देने के बदले में प्रकृति प्राणियों से कुछ पाने की ईच्छा नहीं रखती। लेकीन, वर्षा कराने वाले इन्द्र का लोगों से पूजा पाने की अपेक्षा रहा। तभी, दिवाली पर प्रकृति पूजा की यह रिवाज़ मानवीय दर्प, दंभ व अहंकार के ऊपर विजय का प्रतीक है। 

दिवाली की अंतिम तिथि भैया दूज पर बहनों का भाईयों को टीका लगाना अध्यात्मिक अर्थ में, इंसान को अंतरात्मा व परमात्मा का दिव्य स्मृति दिलाना है। भाईयों के कलाई में रक्षा सूत्र बांधना अर्थात् लोगों में भाई भाई की आत्मिक स्नेह जगाना है। बहन द्वारा मुख मीठा कराने की तात्पर्य, मनुष्यों के सभी संबंधो में रुहानी प्रेम, सम्मान, मधुरता व सदभावना को बढ़ाना है। सार रुप में, दीपावली हमे विश्व शांति, सदभावना, भाईचारे व वसुधैव कुटुंबकम् की पाठ पढ़ाती है।
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