सवाल उठाया जाता है कि भाई की कलाई पर राखी बांधने के लिए मुहूर्त की क्या आवश्यकता है? क्या रक्षा के लिए भी कोई निश्चित समय निर्धारित किया जा सकता है? इस विषय पर आचार्य महामंडलेश्वर ब्रह्माचार्य परमहंस महाराज ने स्पष्ट करते हुए कहा कि यहां रक्षा करने के मुहूर्त की बात नहीं है, बल्कि रक्षा सूत्र बंधन की धार्मिक विधि और उसके शुभ समय की बात है।
रक्षा का मुहूर्त नहीं, रक्षा सूत्र बंधन का मुहूर्त
आचार्य महामंडलेश्वर ब्रह्माचार्य परमहंस महाराज के अनुसार रक्षा करना एक स्वाभाविक जिम्मेदारी और भाव है। इसके लिए किसी मुहूर्त की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन रक्षा सूत्र बांधना एक धार्मिक परंपरा और पर्व का हिस्सा है, इसलिए उसके लिए शुभ समय निर्धारित किया जाता है।
इसे समझने के लिए वे संस्कारों का उदाहरण देते हैं। बच्चे को पढ़ने के लिए किसी मुहूर्त की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन विद्यारंभ संस्कार के लिए शुभ समय निर्धारित किया जाता है। इसी प्रकार प्राकृतिक रूप से बच्चे का जन्म किसी मुहूर्त के अनुसार नहीं होता, लेकिन गर्भाधान संस्कार की अपनी विधि और मुहूर्त होता है।
इसी तरह किसी व्यक्ति को रोज उसके नाम से पुकारने के लिए किसी मुहूर्त की आवश्यकता नहीं है, लेकिन नामकरण संस्कार के लिए शुभ समय देखा जाता है।
अर्थात सामान्य कार्य और धार्मिक संस्कार अथवा पर्व की विधि को एक ही कसौटी पर नहीं रखा जा सकता।
पर्व और घटना में अंतर समझना जरूरी
आचार्य महामंडलेश्वर ब्रह्माचार्य परमहंस महाराज कहते हैं कि किसी घटना का घटित होना और उस घटना को परंपरा के रूप में प्रत्येक वर्ष स्मरण करना अलग-अलग विषय हैं।
रक्षा बंधन केवल भाई-बहन के बीच स्नेह का प्रतीक नहीं, बल्कि रक्षा सूत्र बांधने की एक सनातन परंपरा भी है। इसलिए इसकी धार्मिक विधि में शुभ समय का विचार किया जाता है।
उनका कहना है कि सनातन परंपराओं और पर्वों को बिना उनकी धार्मिक पृष्ठभूमि समझे केवल आधुनिक तर्कों के आधार पर खारिज करना उचित नहीं है।
आखिर त्योहार की तारीख अलग-अलग क्यों होती है?
रक्षा बंधन समेत कई हिंदू त्योहारों की तारीख हर वर्ष एक जैसी नहीं होती। कभी-कभी अलग-अलग पंचांगों या परंपराओं के कारण त्योहार दो अलग-अलग तारीखों पर भी दिखाई देते हैं।
इसके पीछे तिथि, दिनमान, नक्षत्र, राशि, भद्रा और पंचक जैसी ज्योतिषीय एवं पंचांग संबंधी गणनाओं की भूमिका होती है। कई बार तिथि क्षय या तिथि वृद्धि भी होती है, जिसके कारण किसी पर्व की गणना सामान्य कैलेंडर की तारीख से अलग दिखाई दे सकती है।
इसे सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। कुछ दशक पहले मकर संक्रांति सामान्यतः 13 या 14 जनवरी के आसपास मनाई जाती थी, जबकि अब कई वर्षों में यह 14 या 15 जनवरी को आती है। इसके पीछे सौर वर्ष और पंचांग की गणना के साथ-साथ लीप ईयर जैसे खगोलीय-कालगणना संबंधी कारक भी भूमिका निभाते हैं।
इसके अतिरिक्त अलग-अलग संप्रदायों और क्षेत्रों में प्रचलित पंचांग परंपराएं भी पर्व की तिथि अथवा मुहूर्त में अंतर का कारण बन सकती हैं।
सनातन परंपरा को समझने की जरूरत
आचार्य महामंडलेश्वर ब्रह्माचार्य परमहंस महाराज का कहना है कि किसी भी सनातन पर्व की परंपरा पर टिप्पणी करने से पहले उसके पीछे मौजूद शास्त्रीय अवधारणा और पंचांग की गणना को समझना आवश्यक है।
रक्षा बंधन में मुहूर्त का उद्देश्य रक्षा करने के लिए समय तय करना नहीं, बल्कि रक्षा सूत्र बंधन की धार्मिक विधि को शुभ काल में संपन्न करना है।
सनातन धर्म में संस्कार, पर्व और दैनिक जीवन के सामान्य कार्यों की अपनी-अपनी विधियां हैं। इसलिए इनके बीच के अंतर को समझे बिना किसी परंपरा को अंधविश्वास या मिथ्या कहना उचित नहीं होगा।
आचार्य महामंडलेश्वर ब्रह्माचार्य परमहंस महाराज ने कहा कि सनातन परंपराओं को लेकर यदि किसी के मन में कोई जिज्ञासा या शंका है, तो उसका समाधान तर्क, शास्त्र और परंपरा के आधार पर किया जाना चाहिए।






