भारतीय सनातन परंपरा में पितृपक्ष अर्थात आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक 15 दिन पितरों का स्मरण करते हुए उनके नाम से श्राद्ध ,तर्पण और पिंडदान इत्यादि को करना श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष कहलाता है। इस दिन से प्रारम्भ होने वाली इस सनातनी परंपरा को प्रत्येक सनातन परिवार बहुत ही श्रद्धा पूर्वक अंतःकरण से अपने पूर्वजों को याद करते हुए मानता है।
इस पक्ष को हम अपार पक्ष , सोलह श्राद्ध पक्ष ,कनागत ,महालय ,अखाड़पाक ,पितृ पांधार वडा इत्यादि के नाम से भी जानते हैं।
शास्त्रों के अनुसार इन 15 तिथि में अथार्त आश्विन मास की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक की तिथि तक इस पृथ्वी लोक पर पितरों का साम्राज्य चलता है। ऐसी मान्यता है कि इन दिनों में देवताओं के अवकाश के कारण स्वर्ग के द्वार खुले रहते हैं और इन दिनों में प्राकृतिक मृत्यु होने पर आत्मा को सीधे स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
पितृ पक्ष का उल्लेख हिंदू धर्म के शास्त्रों में वेदों में उपनिषद में पुराणों में बहुत ही सम्मान के साथ वैदिक काल से पितरों के लिए श्रद्धा और साथ आयोजित करने का और वैदिक मंत्र द्वारा पूजन ,प्रार्थनाओं से पितरों का वंदन करने का उल्लेख मिलता है।
जैसे ऋग्वेद में कहा गया है कि हे पितरों ! हम तर्पण आपके लिए समर्पित करते हैं। आपको सादर प्रणाम करते हैं। आपको हमारा नमस्कार है। वहीं यजुर्वेद में पितरों की तृप्ति के लिए अनेकों मंत्र वर्णित हैं जिससे प्रमाणित होता है कि पितरों के लिए वैदिक धर्म में श्राद्ध और तर्पण और पिंडदान करके आत्मा की शांति करनी चाहिए और यह वेदों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी है।
गरुड़ पुराण बताता है कि पितृ ऋण का महत्व क्या है और पितृ ऋण से मुक्ति का मार्ग श्राद्ध ,तर्पण, पिंडदान आदि से होकर जाता है।
किसी भी व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष के कारण जीवन में नित्य प्रतिदिन परेशानियां आती ही रही हैं। उसे कष्ट दुख इत्यादि का नित्य सामना करना पड़ता है। पितृ दोष किसी के भी जीवन में बाधा और कोई न कोई अड़चन या रोग लगाकर ही रखता है।
पितृ पक्ष के दौरान पिंडदान करने का विधि को चावल ,जौ , काले तिल और गाय के दूध से बनी गोलाकार पिंड को पितरों की आत्मा के लिए समर्पित किए जाता है और वैदिक विधि पूर्वक पिंडदान की प्रक्रिया परिवार के सबसे बड़े पुत्र व अन्य पुत्रों की उपस्थिति में की जाती है।
दूसरी प्रक्रिया तर्पण की है इसमें पितरों की आत्मा की तृप्ति के लिए जल को कुशा और जौ साथ तथा दूध में काले तिल और शुद्ध जल के साथ वैदिक विधि से समर्पित किया जाता है। ऐसी मान्यता है पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए तथा वंशजों पर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए तर्पण अति आवश्यक है।
इसी प्रक्रिया में श्रद्धा भोज का भी आयोजन का महत्व बताया गया है जिसमें पितरों के लिए सात्विक शुद्ध शाकाहारी भोजन को अर्पित किया जाता है और उसका एक भाग काक , एक भाग श्वान और एक भाग गाय तथा एक भाग ब्राह्मण को पितरों का स्वरूप मानकर अर्पित किया जाता है।
ऐसा माना जाता है यह भोजन का अंश पितरों की क्षुधा और आत्मा की शांति के लिए होता है। और एक भाग निर्धन और भूखे जीवों को यथा शक्ति तथा यथा भक्ति ब्राह्मणों को भोग अन्न ,मुद्रा दान ,वस्त्र इत्यादि के उपरांत दिया जाता है।
जब हम बात पितृपक्ष की कर रहे हैं तो हमें यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि पितृ हैं क्या ? यहाँ पितृ का अर्थ पिता ना होकर अपने पूर्वजों से है। आपके वो पूर्वज जो मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं। इसमें अपने स्वर्गवासी माता पिता ,दादा दादी, परदादा-परदादी , सरदादा – सरदादी और नाना -नानी, परनाना परनानी इत्यादि अर्थात आपकी मातृ पक्ष और पितृ पक्ष की सात पूर्व पीढ़ियां और साथ में जाने अनजाने में दुर्घटना में स्वर्गलोक वासी हुए अपने रक्त के संबंधित परिवारजन। जिनसे आपका रक्त का रिश्ता हो। इसमें आप गर्भपात के कारण भी पितृ दोष के भी भागीदार बन जाते हैं और इसका असर भी आपके ऊपर आता है।
जो भी मृत व्यक्ति आपके रक्त से सीधे संबंधित है वह आपका पितृ कहलाता है। अधिकतर विद्वान इसको तीन पीढियां तक अथवा 100 वर्ष की आयु या मध्य अवधि तक का ही पितृ मानते हैं। लेकिन मेरे अनुसार यह आपकी सात पूर्व पीढ़ियों तक माना जाना चाहिए। आपने देखा भी होगा यह कहावत है कि क्या तुम्हें अपनी सात पीढ़ियों के नाम पता हैं ? यह कहावत इसी से ही निकाल कर आई है। जिससे आप अपने कुल या वंश के पितरों को जान सकें।
पितृ दोष एक बहुत बड़ा दोष कहा गया है इसमें आदमी को यह पता नहीं चलता कि उसके साथ बुरा क्यों हो रहा है जबकि कुंडली में सभी चीज उसके अनुकूल होती हैं। अतः पितृपक्ष को हमें एक संस्कार के रूप में लेना चाहिए और संस्कार का अर्थ अंतः करण और तन ,कर्म की शुद्धि होता है।
अनेकों भ्रांतियां पितृपक्ष के बारे में प्रचलित हैं। जैसे नए कपड़े न पहनना ,केशों को नहीं काटना ,नाख़ून नहीं बनवाना, कोई नया काम नहीं करना , नए वस्त्र नहीं खरीदना ,लकड़ी का काम नहीं करना , आभूषण नहीं खरीदना ,संस्कारों को ना करना आदि आदि।

लेकिन यह सरासर पूर्णता एक भ्रांति है। जैसे मैंने आपसे कहा कि पितृ का अर्थ आपके पूर्वज हैं। अब आप स्वम् कल्पना कीजिये कि आपके घर में कोई अतिथि आता है तो क्या आप उसके सामने अपने फटे पुराने कपड़े या मलिन रहकर आते हैं। शायद किसी भी शर्त कीमत पर नहीं। आप अपने अच्छे से अच्छे कपड़े पहनते हैं। अच्छे से अच्छा भोजन खाते हैं। आप अपने घर को स्वच्छ और व्यवस्थित रखते हैं।
आप आगंतुक को उसको यह दिखाना चाहते हैं कि हम बहुत खुश हैं। जब एक बाहरी व्यक्ति को आप यह सब व्यवहार और अपने आचरण में दिखाना कहते हैं कि हम बहुत प्रसन्न हैं। तो आप अपने पूर्वजों के आगमन पर क्यों मलिन दरिद्र और पुराने मैले कुचैले कपड़ों में रहना चाहते हैं ? किसी भी शास्त्र में यह वर्णन नहीं है कि आप अस्वच्छ और दरिद्र रहें।
किसी भी पूजा में विधान में और यहाँ तक की श्राद्ध ,तर्पण ,पिंडदान में आपको हमेशा नए और स्वच्छ वस्त्र पहनने के लिए कहा गया है। आपने स्वम् अनुभव किया अथवा देखा होगा कि दाह संस्कार तक में नए वस्त्र पहन कर संस्कार किया जाता है तो फिर इस पितृ पूजा में जो पितरों के आगमन का उत्सव है अभिनंदन वंदन है उसमें इस तरह की भ्रान्ति और अवधारणा क्यों?
जो बात शास्त्र सम्मत न हो उसे प्रचलन में नहीं लेना चाहिए। अगर आप इस भ्रान्ति में ही रहना चाहते हैं तो फिर तीन चार दिन पुराना भोजन भी वासी खाइये।जब आप नव भोजन नित्य पकाकर खाते हैं तो पितृ पक्ष की भ्रांतियों को भी त्यागिये।
भारत के दक्षिण भाग में सबसे ज्यादा स्वर्ण आभूषण और नए वस्त्रों की खरीदारी इसी पक्ष में होती है और होनी भी चाहिए और क्यों ना हो। जब हमारे पूर्वज इस धरा पर हमारे घर आ रहे हैं और वो हमें भरपूर समृद्ध , अति प्रसन्न देखेंगे तो वह भी प्रसन्न ही होंगे। हमें इस भ्रांति को अपने मन मस्तिष्क से और विचारों से निकालना होगा कि पितृपक्ष में हमें किसी भी प्रकार का नया काम या आभूषण या वस्त्र को नहीं खरीदना है।
क्या आप किसी गर्भवती स्त्री का बच्चा शिशु इस काल में पैदा होने से रोक सकते हैं ? क्या बच्चा पैदा होना और नवजात का घर में आना क्या एक शुभ कार्य नहीं हुआ ? जब किसी का बच्चे का आगमन प्रसन्नता दे सकता है तो पितरों का आगमन आपको प्रसन्नता क्यों नहीं दे सकता ? आप इन भ्रांतियां को अपने से दूर रखें।
हमारे सनातन धर्म में पंच महाभूत यज्ञ बताए गए हैं जैसे ब्रह्म यज्ञ ,देव यज्ञ, बलिवैश्वदेव यज्ञ , पितृ या भूत यज्ञ ,अतिथि यज्ञ।
इसमें बलिवैश्वदेव यज्ञ जो है वो नित्य जीवन में पितृ पूजन ही हैं। इसमें आपने देखा होगा सरल शब्दों में समझाने की कोशिश करता हूं कि हम जब पहले खाना खाते थे तो उसका एक अंश गौ को ,कौवा को , श्वान को और पर जीवों को निकाल कर रखते थे। हमारे भोजन का पहला एक अंश गाय के लिए पहली रोटी के रूप में तथा अंतिम रोटी श्वान को अंश के रूप में दी जाता था। थाली से हम कुछ भोजन किसी भी भोजन से पूर्व निकालते हैं जो बाद में आश्रित पक्षियों को दिया करते थे इसको हम बलिवैश्वदेव यज्ञ कहते हैं जो अब हमारे संस्कारों से गायब होता जा रहा है।
दूसरा जिसे पितृ या भूत यज्ञ कहते हैं जिसमें कहा गया गया है कि आप अपने ऊपर जो भी निर्भर लोग हैं उनका जल अन्न ,वस्त्र ,उपचार ,औषधि , सेवा आदि उनकी हर इच्छा पूरी करें। उनका ख्याल रखें। उनको यथा सम्भव प्रसन्न रखें।
अतिथि यज्ञ में भी यही था कि आपके घर में कोई अगर अतिथि आता है तो सबसे पहले आप उसकी प्रसन्नता पूर्वक भोजन ग्रहण करवाएं और उसको बहुत सत्कार के शैय्या दें तथा यथा सामर्थ्य दक्षिणा देकर विदा करें।
आपको आश्चर्य होगा कि यही सब तो जब हम पितृपक्ष में कर रहे हैं तो हमें इसमें किस बात की भ्रांति पालनी ? यह किसी भी संस्कार में वर्णित नहीं है हम कुछ नया नहीं खरीदें। हमारे शास्त्रों में प्रत्येक माह का देवता निर्धारित किया गया है और दो पक्ष में जो है कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष हैं में कृष्ण पक्ष पितरों के लिए और शुक्ल पक्ष देवताओं के लिए निर्धारित हैं। दोनों पक्षों को 15- 15 दिन का दोनों को समय दिया गया है और दोनों में तिथि भी चतुर्दशी तक एक ही हैं।
अंतर केवल पूर्णिमा और अमावस्या का का है जो क्रमशः देवताओं और पितरों के लिए निर्धारित हैं। मित्रों मेरी आप सबसे निवेदन है आप पितरों को प्रसन्न रखें हो उसे सब की तरह पितृ पक्ष को मानते हुए अपने पूर्वजों को प्रसन्न रखें और उनकी कृपा दृष्टि ,आशीर्वाद प्राप्त करें।
महामंडलेश्वर ब्रह्माचार्य डॉ. दीपक जी महाराज







