27/08/2018    अवतारी युगपुरुष भगवान श्री कृष्ण को ब्रह्मज्ञान द्वारा तत्त्वरूप से जाने – श्री आशुतोष महाराज जी
उस युग का सर्वाधिक तमग्रस्त काल था वह। अज्ञानता की कालिमा प्रगाढ़तम हो चुकी थी। पापाचार चरम सीमा पर था। चहुँ ओर अधर्म का नग्न ताण्डव हो रहा था। श्रीमद्भागवत के एक रूपक के अनुसार उस समय सहस्त्रों दैत्य राजाओं का रूप धरकर पृथ्वी को आक्रांत कर रहे थे।

उनके दुर्दान्त अत्याचारों से पृथ्वी भयाक्रांत थी। उसका मन खिन्न और शरीर कृश हो चला था। वे गौ रूप धारण कर करुण स्वर रंभा रही थी। इस करुण क्रंदन को सृष्टि के पालनहार कैसे अनसुना कर सकते थे? अतः वे असीम परम सत्ता ससीम मानवीय चोले में सिमट कर इस धरा पर उतर आई। नारायण, नर रूप में अवतरित हुए। निशीथे तम उद्भूते जायमाने जनार्दने- मानों अज्ञानरूप अंधकार को चीरता हुआ ज्ञान रूपी पूर्ण चन्द्रमा द्वापर युगीन नभ में उदित हुआ। यह अतिशुभ घड़ी थी- भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की अर्धरात्रि और यह अवतारी युगपुरुष थे- पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण! श्री कृष्ण, एक ऐसा अलौकिक व्यक्तित्व जिसे किसी एक परिभाषा से चित्रित ही नहीं किया जा सकता। क्या अलंकरण दें हम इन्हें? कहीं ये Click here for more interviews
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