05/06/2019    कैसे और क्यों मनाएं निर्जला एकादशी ?
प्रत्येक वर्ष 24 एकादशियां पड़ती हैं। अधिक मास अर्थात मलमास की अवधि में इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता हैै। इस साल यह एकादशी 13 जून ,गुरुवार को पड़ रही है। वास्तव में यह एकादशी बुधवार की सायं 6 बजकर 27 मिनट पर आरंभ हो जाएगी और गुरुवार की शाम 4 बज कर 50 मिनट तक रहेगी। यह व्रत एकादशी के सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय तक 24 घ्ंाटे की अवधि का माना जाता है।

आज के दिन यह व्रत बिना जल पिए रखा जाता है ,इस लिए इसे निर्जला एकादशी कहा गया है। इस एकादशी का प्रारंभ महाभारत काल के एक संदर्भ से माना गया है जब  सर्वज्ञ वेदव्यास ने पांडवों को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष देने वाले व्रत का संकल्प कराया तो भीम ने कहा कि आप तो 24 एकादशियों का व्रत रखने का संकलप करवा रहे हैं, मैं तो एक दिन भी भूखा नहीं रह सकता। पितामह ने समस्या का निदान करते हुए कहा कि आप निर्जला नामक एकादशी का व्रत रखो। इससे समस्त एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होगा। तभी से हिंदू धर्म में यह व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी तभी से कहा जाने लगा। इस दिन मान्यता है कि जो व्यक्ति स्वयं प्यासा रहकर दूसरों को जल पिलाएगा वह धन्य कहलाएगा।यह व्रत पति-पत्नी, नर नारी कोई भी किसी भी आयु का प्राणी रख सकता है । इस दिन भगवान विश्णु की आराधना का विशेश महत्व है। 

कैसे रखें व्रत?

प्रातः  सूर्याेदय से पूर्व उठें और भगवान विष्णु की मूर्ति  या शालिग्राम को पंचामृत अर्थात दूध, दही, घी,शहद व शक्कर  से स्नान कराएं या चित्र के आगे ज्योति प्रज्जवलित करके तुलसी एवं फल अर्पित करते हुए आराधना करें । मूर्ति को नए वस्त्र अर्पित करें । या किसी मंदिर में भगवान विश्णु के दर्शन करें ।  निर्जल व्रत रखें । ओम् नमो भगवते वासुदेवाय: का जाप करें और जल, वस्त्र, छतरी , घड़ा ,खरबूजा, फल ,शरबत आदि का दान करना लाभकारी रहता है। या गर्मी से बचने की सामग्री दान करें । अगले दिन जल ग्रहण करके व्रत का समापन करें । 


आज के वर्तमान संदर्भ में निर्जला एकादशी का महत्व एवं उपाय

यह व्रत वर्तमान व्यवस्था जिसमें आने वाले समय में जल की कमी होने वाली है, उसके आपात काल को सहने का प्रशिक्षण देता है और आपको कई आपात परिस्थितियों में जल के बिना रहने की क्षमता भी प्रदान करता है। हमारे सैनिक कई ऐसी आपात स्थिति में 48 डिग्री तापमान में फंस जाते हैं, यदि उनकी कठोर   ट्र्ेनिंग न हो तो वे देश की रक्षा नहीं कर पाएंगे। इसी लिए यह व्रत हमें किसी भी ऐसी अप्रत्याशित आपात स्थिति से जूझने का साहस प्रदान करता है। मई जून की गर्मी में ही यह व्रत आपकी सही परीक्षा लेता है और आपकी शारीरिक क्षमता का मूल्यांकन करता है कि क्या आप कल को पानी की कमी झेल पाएंगे।

आधुनिक युग में गर्मी से स्वयं बचने और दूसरों को भी बचाने के लिए आप र्प्यावरण को और सुदृढ़ बनाने के लिए निर्जला एकादशी पर सार्वजनिक स्थानों पर प्याउ लगवाएं, वाटर कूलर की वयवस्था करें, निर्धनों को खरबूजे, तरबूज जैसे अधिक जल वाले फल दें। दूध , लस्सी, आईसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक, जूस आदि की सार्वजनिक व्यवस्था पूरी गर्मी के महीनों तक करें। फल व छायादार वक्ष लगाएं। जहां जनसाधारण को आवश्यकता हो अपनी क्षमतानुसार या चंदा एकत्रित करके एयर कंडीशनर , पंखे ,कूलर आदि का दान करें ।

यह व्रत हमारे देश की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है जहां कहा गया है- सर्वे संतु सुखिना...तथा  सरबत दा भला। विश्व का कल्याण हो प्राणियों में सद्भावना हो । समाज का कमजोर वर्ग असहाय न रह जाए, सभी सुखी रहें , निरोगी रहें। एक दूसरे के प्रति समाज में समर्पण की भावना रहे , एक दूसरे की  सहायता को तत्पर रहें। सिख समुदाय ऐसी जल की छबीलें कई अवसर पर लगा कर भारतीय दर्शन को आगे बढ़ाता है और भारत में ही नहीं अपितु विश्व में सरबत दा भला की फिलासफी का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे पर्वों को सामूहिक रुप से मनाना आज के संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण एवं समय की मांग हो गया है। आइये सभी भारतवासी इस व्रत को मनाएं और जल बचाने का प्रयास करें। जल है तो कल है का नारा ही निर्जला एकादशी का संदेश है।

निर्जला एकादशी व्रत पूजा विधि

जो श्रद्धालु वर्षभर की समस्त एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते हैं उन्हें निर्जला एकादशी का उपवास अवश्य करना चाहिए। क्योंकि इस व्रत को रखने से अन्य सभी एकादशियों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। इस व्रत की विधि इस प्रकार है:

1.  इस व्रत में एकादशी तिथि के सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक जल और भोजन ग्रहण नहीं किया जाता है। 
2.  एकादशी के दिन प्रात:काल स्नान के बाद सर्वप्रथम भगवान विष्णु की विधि विधान से पूजा करें। इसके पश्चात भगवान का ध्यान करते हुए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। 
3.  इस दिन भक्ति भाव से कथा सुनना और भगवान का कीर्तन करना चाहिए।4.  इस दिन व्रती को चाहिए कि वह जल से कलश भरे व सफ़ेद वस्त्र को उस पर ढककर रखें और उस पर चीनी तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें।

इसके बाद दानपुण्य आदि कर इस व्रत का विधान पूर्ण होता है। धार्मिक महत्त्व की दृष्टि से इस व्रत का फल लंबी उम्रस्वास्थ्य देने के साथ-साथ सभी पापों का नाश करने वाला माना गया है।

 

एकादशी तिथि – 13 जून 2019

पारण का समय – 05:27 से 08:13 बजे तक (14 जून 2019)

एकादशी तिथि आरंभ – 06:27 बजे (12 जून 2019)

एकादशी तिथि समाप्त – 04:49 बजे (13 जून 2019)

 


निर्जला एकादशी की पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत के संदर्भ में निर्जला एकादशी की कथा मिलती जो इस प्रकार है। हुआ यूं कि सभी पांडवों को धर्मअर्थकाम और मोक्ष प्राप्ति के लिये महर्षि वेदव्यास ने एकादशी व्रत का संकल्प करवाया। अब माता कुंती और द्रोपदी सहित सभी एकादशी का व्रत रखते लेकिन भीम जो कि गदा चलाने और खाना खाने के मामले में काफी प्रसिद्ध थे। कहने का मतलब है कि भीम बहुत ही विशालकाय और ताकतवर तो थे लेकिन उन्हें भूख बहुत लगती थी। उनकी भूख बर्दाश्त के बाहर होती थी इसलिये उनके लिये महीने में दो दिन उपवास करना बहुत कठिन था। जब पूरे परिवार का उन पर व्रत के लिये दबाव पड़ने लगा तो वे इसकी युक्ति ढूंढने लगे कि उन्हें भूखा भी न रहने पड़े और उपवास का पुण्य भी मिल जाये। अपने उदर पर आयी इस विपत्ति का समाधान भी उन्होंने महर्षि वेदव्यास से ही जाना। भीम पूछने लगे हे पितामह मेरे परिवार के सभी सदस्य एकादशी का उपवास रखते हैं और मुझ पर भी दबाव बनाते हैं लेकिन मैं धर्म-कर्मपूजा-पाठदानादि कर सकता हूं लेकिन उपवास रखना मेरे सामर्थ्य की बात नहीं हैं। मेरे पेट के अंदर वृक नामक जठराग्नि है जिसे शांत करने के लिये मुझे अत्यधिक भोजन की आवश्यकता होती है अत: मैं भोजन के बिना नहीं रह सकता। तब व्यास जी ने कहाभीम यदि तुम स्वर्ग और नरक में यकीन रखते हो तो तुम्हारे लिये भी यह व्रत करना आवश्यक है। इस पर भीम की चिंता और भी बढ़ गईउसने व्यास जी कहाहे महर्षि कोई ऐसा उपवास बताने की कृपा करें जिसे साल में एक बार रखने पर ही मोक्ष की प्राप्ति हो। इस पर महर्षि वेदव्यास ने गदाधारी भीम को कहा कि हे वत्स यह उपवास है तो बड़ा ही कठिन लेकिन इसे रखने से तुम्हें सभी एकादशियों के उपवास का फल प्राप्त हो जायेगा। उन्होंने कहा कि इस उपवास के पुण्य के बारे में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने मुझे बताया है। तुम ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का उपवास करो। इसमें आचमन व स्नान के अलावा जल भी ग्रहण नहीं किया जा सकता। अत: एकादशी के तिथि पर निर्जला उपवास रखकर भगवान केशव यानि श्री हरि की पूजा करना और अगले दिन स्नानादि कर ब्रहाम्ण को दान-दक्षिणा देकरभोजन करवाकर फिर स्वयं भोजन करना। इस प्रकार तुम्हें केवल एक दिन के उपवास से ही साल भर के उपवासों जितना पुण्य मिलेगा। महर्षि वेदव्यास के बताने पर भीम ने यही उपवास रखा और मोक्ष की प्राप्ति की।

भीम द्वारा उपवास रखे जाने के कारण ही निर्जला एकादशी को भीमसेन एकादशी और चूंकि पांडवों ने भी इस दिन का उपवास रखा तो इस कारण इसे पांडव एकादशी भी कहा जाता है।


- मदन गुप्ता सपाटू, 196 सैक्टर 20ए, चंडीगढ़

 

MADAN GUPTA SPATU
Author & Astrologer
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