राष्ट्रीय (03/07/2019) 
देवशयनी एकादशी 12 जुलाई 2019


आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी के ना से जाना जाता हैइसे पद्मा एकादशी भी कहते हैं। देवशयनी एकादशी प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा के तुरन्त बाद आती है

इस वर्ष देवशयनी  एकादशी 12 जुलाई 2019 के दिन मनाई जानी हैइसी दिन से चातुर्मास का आरंभ भी माना गया है.देवशयनी एकादशी को हरिशयनी एकादशी और पद्मनाभा के नाम से भी जाना जाता है सभी उपवासों में देवशयनी एकादशी व्रत श्रेष्ठतम कहा गया हैइस व्रत को करने से भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होतीहैंतथा सभी पापों का नाश होता हैइस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा अर्चना करने का महतव होता है क्योंकि इसी रात्रि से भगवान का शयन काल आरंभ हो जाता है जिसे चातुर्मास या चौमासा का प्रारंभ भी कहते हैं.

एकादशी तिथि प्रारम्भ = १२/जुलाई/२०१९ को ०१:०२ बजे

एकादशी तिथि समाप्त = १३/जुलाई/२०१९ को ००:३१ बजे

१३ जुलाई कोपारण (व्रत तोड़ने का) समय = ०६:३० से ०८:१९

पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय = ०६:३०

देवशयनी एकादशी के दिन से भगवान विष्णु का शयनकाल प्रारम्भ हो जाता है इसीलिए इसे देवशयनी एकादशी कहते हैं। देवशयनी एकादशी के चार माह के बाद भगवान् विष्णु प्रबोधिनी एकादशी के दिन जागतें हैं।

एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।

एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है तो उसे मध्यान के बाद पारण करना चाहिए।

कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियोंविधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।.

देवशयनी एकादशी नाम से ही स्पष्ट है कि इस दिन श्रीहरि शयन करने चले जाते हैं। इस अवधि में श्रीहरि पाताल के राजा बलि के यहां चार मास निवास करते हैं।

 

चातुर्मास असल में संन्यासियों द्वारा समाज को मार्गदर्शन करने का समय है। आम आदमी इन चार महीनों में अगर केवल सत्य ही बोले तो भी उसे अपने अंदर आध्यात्मिक प्रकाश नजर आएगा।

 

इन चार मासों में कोई भी मंगल कार्य- जैसे विवाहनवीन गृहप्रवेश आदि नहीं किया जाता है। ऐसा क्योंतो इसके पीछे सिर्फ यही कारण है कि आप पूरी तरह से ईश्वर की भक्ति में डूबे रहेंसिर्फ ईश्वर की पूजा-अर्चना करें। बदलते मौसम में जब शरीर में रोगों का मुकाबला करने की क्षमता यानी प्रतिरोधक शक्ति बेहद कम होती हैतब आध्यात्मिक शक्ति प्राप्ति के लिए व्रत करनाउपवास रखना और ईश्वर की आराधना करना बेहद लाभदायक माना जाता है।

देवशयनी या हरिशयनी एकादशी के विषय में पुराणों में विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है जिनके अनुसार इस दिन से भगवान श्री विष्णु चा मास की अवधि तक पाताल लोक में निवास करते हैकार्तिक मास केशुक्ल पक्ष की एकादशी से श्री विष्णु उस लोक के लिये गमन करते है और इसके पश्चात चार माह के अतंराल बाद सूर्य के तुला राशि में प्रवेश करने पर विष्णु भगवान का शयन समाप्त होता है तथा इस दिन को देवोत्थानी एकादशी का दिन होता हैइन चार माहों में भगवान श्री विष्णु क्षीर सागर की अनंत य्या पर शयन करते हैइसलिये इन माह अवधियों में कोई भी धार्मि कार्य नहीं किया जाता है.

देवशयनी एकादशी व्रत की शुरुआत दशमी तिथि की रात्रि से ही हो जाती हैदशमी तिथि की रात्रि के भोजन में नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिएअगले दिन प्रातकाल उठकर देनिका कार्यों से निवृत होकर व्रतका संकल्प करें भगवान विष्णु की प्रतिमा को आसन पर आसीन कर उनका षोडशोपचार सहित पूजन रना चाहिए.  पंचामृत से स्नान करवाकरतत्पश्चात भगवान की धूपदीपपुष् आदि से पूजा करनीचाहिए.  भगवान को ताम्बूलपुंगीफल अर्पित करने के बाद मन्त्र द्वारा स्तुति की जानी चाहिएइसके अतिरिक्त शास्त्रों में व्रत के जो सामान्य नियम बताये गए हैउनका सख्ती से पालन करना चाहिए.

इस व्रत को करने से समस्त रखते वाले व्यक्ति को अपने चित

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