नई दिल्ली। जिला बार काउंसिलों में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी आदेश जारी किया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि जिला स्तर की बार काउंसिलों में महिलाओं के लिए 20 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य रूप से लागू किया जाए तथा अतिरिक्त 10 प्रतिशत पदों को महिलाओं के लिए सह-नामित (को-ऑप्टेड) श्रेणी में सुरक्षित रखा जाए।
यह मामला वर्ष 2023 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। देशभर की बार काउंसिलों में महिला प्रतिनिधित्व की कमी को गंभीर मुद्दा बताते हुए दो महत्वपूर्ण याचिकाएँ दायर की गई थीं। पहली याचिका शोभा गुप्ता (योगमाया) बनाम Union of India में बार काउंसिलों के निर्णयकारी पदों पर महिलाओं की अत्यंत कम उपस्थिति को लेकर चिंता जताई गई थी। दूसरी याचिका shehla चौधरी बनाम Union of India थी, जिसे 4 नवंबर 2025 को दायर किया गया। इस याचिका को अधिवक्ता चारु माथुर और नीमा रानी ने दाखिल किया था। सुप्रीम कोर्ट ने 4 दिसंबर 2025 को दोनों याचिकाओं को एक साथ सुनवाई के लिए क्लब कर लिया।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि लगभग 33 प्रतिशत महिला अधिवक्ताओं ने जिला बार काउंसिलों में महिला नेतृत्व बढ़ाने के लिए आरक्षण लागू करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया था। सभी दलीलों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि महिलाओं के लिए 20 प्रतिशत आरक्षण और अतिरिक्त 10 प्रतिशत सह-नामित पदों का प्रावधान महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए अत्यंत आवश्यक है। अदालत ने यह भी माना कि बार काउंसिल जैसे लोकतांत्रिक और प्रतिनिधिक संस्थानों में लैंगिक संतुलन स्थापित करना समय की मांग है, और इससे न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता तथा प्रभावशीलता और मजबूत होगी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल अधिवक्ता समुदाय में महिला सशक्तिकरण को नई ऊँचाई देगा, बल्कि देश की न्याय प्रणाली में समान और संतुलित प्रतिनिधित्व की अवधारणा को भी मजबूती प्रदान करेगा।





