पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान करने में शैक्षणिक संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका: प्रो. मेहराज उद्दीन मीर, कुलपति

( के.आर. मंगालम विश्वविद्यालय ने “भूमि सुपोषण फॉर वन हेल्थ” पहल का आयोजन कर मिट्टी और मानव स्वास्थ्य को बढ़ावा दिया इस कार्यक्रम में लगभग 200
प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें छात्र, संकाय सदस्य, किसान और कर्मचारी शामिल थे। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों को सम्मानित किया गया।कार्यक्रम का
आयोजन डॉ. मोनिका यादव, कार्यक्रम समन्वयक, यूथ रेड क्रॉस समिति द्वारा किया गया तथा इसका समन्वयन डॉ. अंजली तोमर ने स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज़ की छात्राओं हर्षिता और नीतू शर्मा के सहयोग से किया।)

स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज़ , के.आर. मंगालम विश्वविद्यालय ने यूथ रेड क्रॉस समिति के साथ, दिल्ली फार्मास्यूटिकल साइंसेज़ एंड रिसर्च यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली तथा अक्षय कृषि परिवार के सहयोग से “भूमि सुपोषण फॉर वन हेल्थ: एक स्वास्थ्य जागरूकता पहल” शीर्षक से एक महत्वपूर्ण जागरूकता कार्यक्रम का सफल आयोजन किया।

प्रारंभिक संबोधन देते हुए, प्रो. जे.एस. यादव, डीन, स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज़ ने मिट्टी के स्वास्थ्य के महत्व पर जोर दिया और कृषि शिक्षा को नवाचार,
व्यावहारिक अनुभव और स्थिरता-आधारित दृष्टिकोण के साथ जोड़ने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि भूमि सुपोषण कार्यक्रम सतत कृषि, मिट्टी के स्वास्थ्य और सामुदायिक कल्याण के प्रति हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

डॉ. आलोक कुमार गुप्ता, राष्ट्रीय समन्वयक, भूमि सुपोषण एवं संरक्षण जन अभियान, अक्षय कृषि परिवार ने विस्तृत और ज्ञानवर्धक संबोधन में मिट्टी के स्वास्थ्य की बहाली की तत्काल आवश्यकता और इसके खाद्य सुरक्षा तथा जनस्वास्थ्य पर सीधे प्रभाव को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि वर्षों में हमारी मिट्टी किस प्रकार क्षरित हुई है
जैविक तथा प्राकृतिक खेती अपनाकर मिट्टी की गुणवत्ता, जैव विविधता, वनस्पति और जीव-जंतुओं में सुधार के उपाय सुझाए।

विशेषज्ञ सत्र के अंतर्गत, डॉ. अग्निभा सिन्हा, सहायक प्रोफेसर, स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज़ ने “मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए कृषि-विज्ञान आधारित हस्तक्षेप” विषय पर व्याख्यान दिया, जिसमें व्यावहारिक और सतत कृषि तकनीकों पर ध्यान केंद्रित किया गया।

प्रो. मेहराज उद्दीन मीर, कुलपति, के.आर. मंगलम विश्वविद्यालय के दूरदर्शी संबोधन ने, जिसमें उन्होंने पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान करने और सतत कृषि प्रथाओं
को बढ़ावा देने में शैक्षणिक संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला तथा स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज की पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह पहल के.आर.मंगलम विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज़ की सतत कृषि, पर्यावरण जागरूकता और “स्वस्थ मिट्टी, स्वस्थ भोजन, स्वस्थ लोग” की
समग्र दृष्टि को आगे बढ़ाने की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

अपने जोशीले संक्षिप्त भाषण ब्यूरो चीफ विजय गौड़ ने कहा कि मातृभूमि के प्रति प्यार , सच्ची नागरिकता का परिचय है और भूपोषण के प्रति जागरूकता की कटिबद्धता समय की आवश्यकता है मातृभू के प्रति अगाध प्रेम को कवि की पंक्तियों में उन्होंने तालियों की गड़गड़ाहट में कहा कि “तन समर्पित,मन समर्पित और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ मातृ भू तुझको अभी कुछ और भी दूँ।”

डीपीएसआरयू की फिजियोथेरेपी सहायक प्रोफेसर डॉ. पारुल शर्मा ने कहा कि मिट्टी कोई शोषण करने योग्य संसाधन नहीं, बल्कि एक मां है जिसकी देखभाल करनी चाहिए। पृथ्वी हमें सब कुछ देती है, उसे स्वस्थ रखना हमारी जिम्मेदारी है। डीपीएसआरयू की सहायक प्रोफेसर डॉ० राशि गुप्ता के अनुसार “भूमि सुपोषण” का अर्थ है मिट्टी को समग्र रूप से पोषित करना — केवल पौधों को नहीं बल्कि मिट्टी के भीतर जीवन को बनाए रखना। केवल एक मुट्ठी मिट्टी में अरबों सूक्ष्मजीव — बैक्टीरिया, कवक, प्रोटोज़ोआ — मौजूद होते हैं। ये सूक्ष्मजीव पोषण चक्र, पौधों की वृद्धि, रोग नियंत्रण और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अगर मिट्टी शरीर है, तो माइक्रोबायोम इसकी आत्मा है। डॉ. राबिया बसरी, सहायक प्रोफेसर, ने पर्यावरण-अनुकूल तरीकों से मिट्टी और फसल के स्वास्थ्य को बढ़ाने में जैव-इनपुट्स की भूमिका पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम का समापन प्रतिभागियों द्वारा मिट्टी संरक्षण और पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा देने की सामूहिक शपथ के साथ हुआ, जिसके बाद प्रो. नवीन कुमार, स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज़ द्वारा औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया।

  • Leema

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