पितृदोष की चर्चा केवल जन्मकुंडली तक सीमित नहीं है। हस्तरेखा शास्त्र की कुछ परंपराओं में हाथ के पर्वतों और रेखाओं को भी व्यक्ति के जीवन में आने वाली पारिवारिक एवं पूर्वजों से जुड़ी बाधाओं के संकेत के रूप में देखा जाता है।
विशेष रूप से हाथ में स्थित मंगल क्षेत्र (Mars Mounts) को साहस, संघर्ष, ऊर्जा और जीवन में आने वाली चुनौतियों से जोड़कर देखा जाता है। कुछ हस्तरेखा मतों में मंगल क्षेत्र की असामान्य स्थिति, उस पर अत्यधिक क्रॉस, द्वीप, जालीनुमा चिह्न या अन्य अशुभ माने जाने वाले निशानों को पारिवारिक तनाव अथवा पूर्वजों से संबंधित बाधाओं के संभावित संकेतों से जोड़ा जाता है।
हालांकि केवल मंगल क्षेत्र देखकर यह कहना कि किसी जातक की जन्मकुंडली में निश्चित रूप से पितृदोष है, ज्योतिषीय दृष्टि से भी उचित नहीं होगा।
मंगल पर्वत को कैसे देखा जाता है?
हस्तरेखा शास्त्र में मंगल से संबंधित क्षेत्र सामान्यतः हाथ के दो हिस्सों से जोड़े जाते हैं—
निम्न मंगल (Lower Mars): अंगूठे के विपरीत, जीवन रेखा के बाहरी क्षेत्र के पास माना जाता है।
उच्च मंगल (Upper Mars): हथेली के बाहरी हिस्से में, हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा के बीच के क्षेत्र में माना जाता है।
कुछ परंपराओं में हथेली के मध्य के मैदानी मंगल (Plain of Mars) को भी अलग से देखा जाता है।
इन क्षेत्रों की बनावट, उभार, रेखाओं और चिह्नों की व्याख्या हस्तरेखा विशेषज्ञ अपनी पद्धति के अनुसार करते हैं।
यदि किसी व्यक्ति के हाथ में मंगल क्षेत्र पर कोई विशेष निशान दिखाई देता है, तो उसे तुरंत पितृदोष का प्रमाण मान लेना उचित नहीं है। हस्तरेखा में सामान्यतः कई रेखाओं और पर्वतों को एक साथ देखकर निष्कर्ष निकाला जाता है।
इसी तरह जन्मकुंडली में भी सूर्य, राहु-केतु, नवम भाव, पंचम भाव और संबंधित ग्रहों की स्थिति का विस्तृत अध्ययन किया जाता है।
इसलिए यदि कोई व्यक्ति पितृदोष को लेकर चिंतित है, तो कुंडली और हस्तरेखा दोनों को केवल धार्मिक/ज्योतिषीय परंपरा के संदर्भ में देखकर ही कोई निष्कर्ष निकालना चाहिए।
पितरों की शांति के लिए सबसे सरल मार्ग
चाहे कुंडली में कोई योग हो या हाथ में कोई विशेष चिह्न, पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए किसी महंगे उपाय की आवश्यकता अनिवार्य नहीं मानी जानी चाहिए।
अमावस्या पर पितरों का स्मरण करें, अपनी परंपरा के अनुसार तर्पण करें और उनके नाम पर—
भूखे को भोजन, जरूरतमंद को वस्त्र और गरीब बच्चे को शिक्षा में सहयोग दें।
धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसे निःस्वार्थ कार्यों से पितरों की प्रसन्नता और परिवार पर उनके आशीर्वाद की कामना की जाती है।
**क्योंकि पितृदोष का डर मन में रखने से अधिक महत्वपूर्ण है पितरों के अच्छे संस्कारों को अपने जीवन में उतारना।






