क्या वास्तव में वर्ष नया होता है?

दुनिया में विभिन्न प्रकार के कैलेंडर उपयोग में हैं, जिनकी संख्या अनेक दर्जनों में है। प्रत्येक कैलेंडर का आधार भौगोलिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और खगोलीय घटनाओं पर, किसी खास जाति या समुदाय की मान्यताओं अर्थात् अंधविश्वासों पर आधारित हैं। इसका अर्थ हुआ कि सचमुच में कोई नूतन दिन नहीं होता, अथवा कहा जा सकता है कि प्रत्येक दिन ही नया होता है। यहां कुछ प्रमुख 10 कैलेंडरों और उनके नववर्ष की शुरुआत की जानकारी दी गई है:

ग्रेगोरियन कैलेंडर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक प्रचलित कैलेंडर है, जिसकी शुरुआत 1 जनवरी से होती है। जूलियन कैलेंडर का उपयोग कुछ रूढ़िवादी ईसाई समुदाय करते हैं, और इसकी शुरुआत ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 14 जनवरी से होती है। हिजरी कैलेंडर इस्लामी समुदाय द्वारा उपयोग किया जाता है और यह मुहर्रम माह की पहली तिथि से आरंभ होता है।

विक्रम संवत का उपयोग भारत और नेपाल में किया जाता है, और इसकी शुरुआत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (मार्च-अप्रैल के आसपास) से होती है। शक संवत भारत का सरकारी कैलेंडर है, जो चैत्र माह की पहली तिथि (मार्च-अप्रैल के आसपास) से शुरू होता है। चाइनीज़ कैलेंडर चीन और अन्य पूर्वी एशियाई देशों में उपयोग किया जाता है और यह वसंत पर्व (जनवरी या फरवरी में) से आरंभ होता है।

जापानी कैलेंडर जापान में प्रचलित है, जिसकी शुरुआत 1 जनवरी (ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार) से होती है। इसमें सम्राट के नाम पर युग निर्धारण भी किया जाता है। यहूदी कैलेंडर यहूदी समुदाय द्वारा उपयोग किया जाता है और इसकी शुरुआत रोश हशना (सितंबर-अक्टूबर में) से होती है। थाई कैलेंडर थाईलैंड में प्रचलित है, और यह सोंगक्रान उत्सव के दौरान 13-15 अप्रैल से आरंभ होता है। एथियोपियन कैलेंडर इथियोपिया में उपयोग किया जाता है और इसकी शुरुआत 11 या 12 सितंबर से होती है।

सद्गुरु ओशो का प्रेरणादायक प्रवचन “जीवन रहस्य” हमें हर क्षण को नया और सार्थक बनाने के उपाय सिखाता है। उन्होंने जीवन को समझने और जीने का एक गहरा दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

ओशो के अनुसार, जीवन का हर क्षण अपने आप में अनोखा और ताजा होता है। इसे पुरानी सोच और मानसिकता से देखने के बजाय नई दृष्टि से अपनाना चाहिए। नयापन किसी बाहरी वस्तु में नहीं, बल्कि हमारी सोच और दृष्टिकोण की ताजगी में छिपा होता है। जीवन को सही मायने में सार्थक बनाने के लिए हमें पुराने अनुभवों और आदतों को छोड़ने की कला सीखनी चाहिए।

जीवन की अनिश्चितता को अपनाने से हर दिन को एक नई शुरुआत के रूप में जीने का अवसर मिलता है। इसके विपरीत, केवल बाहरी दिखावे या उत्सवों में नयापन ढूंढने से बचना चाहिए। सच्चा नयापन हमें अपने भीतर खोजना चाहिए और हर क्षण को एक नए तरीके से जीना चाहिए।

ओशो ने भौतिकवाद और अध्यात्म के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। भौतिकवादी व्यक्ति बाहरी चीजों में नयापन खोजता है, जबकि आध्यात्मिक व्यक्ति अपने भीतर नयापन लाने का प्रयास करता है। उनके अनुसार, असली शुभकामना यह है कि हम अपने जीवन में सच्चा नयापन लाएं—चाहे वह हमारी सोच, दृष्टिकोण, या जीवन शैली में ही क्यों न हो। ओशो का यह संदेश हमें प्रेरित करता है कि हम जीवन के हर क्षण को नई ऊर्जा और उत्साह के साथ जिएं और इसे सार्थक बनाएं।

सदगुरु ओशो का उपरोक्त प्रवचन निम्नांकित लिंक से सुना या पढ़ा जा सकता है–

  • Leema

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