हेडलाइन: पहाड़ की सुंदरता और पानी के बाद, अब पहाड़ का ‘कचरा’ भी बनेगा उसकी नई पहचान!


जयहरिखाल (लैंसडाउन) | 7 फरवरी, 2026
उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन और प्रदूषण की खबरों के बीच ’11 गाँव आंदोलन’ ने उम्मीद की एक नई अलख जगाई है। जयहरिखाल ब्लॉक में चल रहे इस आंदोलन ने महज सफाई नहीं, बल्कि ‘वैज्ञानिक कचरा क्रांति’ का आगाज़ कर दिया है।
हाल ही में आंदोलन के प्रतिनिधियों ने उप-जिलाधिकारी (SDM) लैंसडाउन को एक ऐसी वैज्ञानिक ऑडिट रिपोर्ट सौंपी है, जिसने प्रशासन को भी हैरान कर दिया है।

आंकड़ों की ज़ुबानी, बदलाव की कहानी
जनवरी और फरवरी के बीच, जब लोग कड़ाके की ठंड में घरों में दुबके थे, तब 11 गाँव आंदोलन के स्वयंसेवकों ने 385 से अधिक मानव-घंटे खपाकर 922.17 किलोग्राम कचरे का पोस्टमार्टम किया। जानिए पूरी कहानी इस खास रिपोर्ट में :
प्लास्टिक का जाल: 284.14 किलो प्लास्टिक, जो पहाड़ों की नसों में ज़हर घोल रहा था।
कांच का खतरा: 240.12 किलो कांच, जो न केवल पर्यावरण बल्कि वन्यजीवों के लिए भी जानलेवा है।
लीगेसी वेस्ट: मिट्टी में दशकों से दबा 155.14 किलो पुराना कचरा निकाला गया।


हैरानी की बात यह है कि यह पूरा काम महज ₹11 प्रति किलो की न्यूनतम लागत पर किया गया है!
‘घोस्ट विलेज’ से ‘होस्ट विलेज’ का सफर
आंदोलन के संस्थापक आकाश सुंदरीयाल का विजन स्पष्ट है। वे कहते हैं, “हमें पर्यटन को पहाड़ों का भक्षक नहीं, बल्कि रक्षक बनाना है।” यह आंदोलन सिर्फ सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके चार मज़बूत स्तंभ हैं:
पठाल से पहचान: विलुप्त होती पारंपरिक पत्थर की वास्तुकला का संरक्षण।
रसोई से रोज़गार: स्थानीय स्वाद को स्वरोज़गार का जरिया बनाना।
द फॉर्गोटन ट्रेल्स: पुराने रास्तों को खोजकर ट्रेकिंग के नए आयाम खोलना।
ग्रीन इकोनॉमी: कचरे और विरासत को जोड़कर स्थानीय लोगों के लिए आय के साधन बनाना।
अगला पड़ाव: 11 और 14 फरवरी
आंदोलन अब रुकने वाला नहीं है। 11 फरवरी को जयहरिखाल बाज़ार से सकमुंडा तक एक विशाल सामुदायिक अभियान चलेगा, जिसमें 500 किलो से अधिक कचरा जुटाने का लक्ष्य है। इसके बाद 14 फरवरी को क्षेत्रीय प्रतिबद्धता को और मज़बूत किया जाएगा।
इस आंदोलन में अपना योगदान देने भारत के हर कोने से जेन जी अपनी दिलचस्पी दिखा रहे हैं और अपना योगदान दे रहे हैं।


दिल्ली युनिवर्सिटी से ज्योग्राफी के पीएचडी स्कॉलर शौर्याभ श्रीवास्तव मानते हैं कि हिमालय लिए ये आंदोलन किसी वरदान से कम नहीं।
इस तरह 11 गाँव आंदोलन ने साबित कर दिया है कि अगर समुदाय ठान ले, तो डेटा और तकनीक के दम पर हिमालय को फिर से स्वच्छ और आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। यह ‘जयहरिखाल मॉडल’ आज पूरे उत्तराखंड के लिए एक मिसाल है।

वरिष्ठ पत्रकार मालिनी श्रीवास्तव

  • Leema

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