दिल्ली पुलिस पब्लिक लाइब्रेरी में स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में साहित्यिक गोष्ठी (मुशायरा एवं कवि सम्मेलन) आयोजित
दिल्ली पुलिस की सामुदायिक पहल दिल्ली पुलिस पब्लिक लाइब्रेरी के तत्वावधान में भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के उपलक्ष्य में शनिवार को मेट्रो पुलिस स्टेशन, ओखला विहार स्थित दिल्ली पुलिस पब्लिक लाइब्रेरी में एक भव्य “साहित्यिक गोष्ठी (मुशायरा एवं कवि सम्मेलन)” का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के महाप्रबंधक (रीटेल सेल्स) श्री आलोक श्रीवास्तव ‘अविरल’ थे। विशिष्ट अतिथि के रूप में एडवोकेट ख़लील-उर-रहमान, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता, प्रख्यात लेखक एवं आलोचक तथा डॉ. इदरीस अहमद, निदेशक, ग़ालिब इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली उपस्थित रहे।
कार्यक्रम दो सत्रों में सम्पन्न हुआ।
प्रथम सत्र का संचालन करते हुए इंस्पेक्टर सुहैब फ़ारूक़ी ने अपने स्वागत वक्तव्य में दिल्ली पुलिस पब्लिक लाइब्रेरी की चौदह वर्षीय यात्रा, कम्युनिटी पुलिसिंग के अंतर्गत उसकी भूमिका तथा समाज, प्रशासन और विशेष रूप से पुलिस एवं आमजन के बीच विश्वास का सेतु निर्मित करने में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि साहित्य, शिक्षा और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से लाइब्रेरी संवाद, विश्वास और सामाजिक सहभागिता को सुदृढ़ करने का सतत प्रयास कर रही है। साहित्यिक गोष्ठियाँ केवल रचनाओं के पाठ का मंच नहीं, बल्कि समुदाय, प्रशासन और विशेष रूप से पुलिस तथा आमजन के बीच संवाद, विश्वास और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने का प्रभावी माध्यम हैं। अपने विशिष्ट एवं रोचक अंदाज़ में उन्होंने मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों तथा नाज़िम-ए-मुशायरा का परिचय भी प्रस्तुत किया।
इसके उपरांत एडवोकेट ख़लील-उर-रहमान ने “भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण में मुशायरों का महत्व” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मुशायरे केवल काव्य-पाठ के मंच नहीं, बल्कि भाषा, संस्कृति और साझा विरासत के संरक्षण के सशक्त माध्यम हैं। उन्होंने कहा कि मुशायरे हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब की जीवित परंपरा हैं, जिन्हें नई पीढ़ी तक पहुँचाना समय की आवश्यकता है।
इसके पश्चात डॉ. इदरीस अहमद, निदेशक, ग़ालिब इंस्टीट्यूट ने “साहित्य के प्रचार-प्रसार में गैर-सरकारी संस्थाओं की भूमिका” विषय पर अपने विद्वत्तापूर्ण विचार रखते हुए कहा कि साहित्यिक संस्थाएँ समाज में सांस्कृतिक चेतना, भाषा और रचनात्मक संवाद को जीवित रखने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी प्रयासों के साथ-साथ सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी ही साहित्य के व्यापक प्रसार का आधार बनती है।
तत्पश्चात एसीपी यातायात श्री भानु प्रताप शर्मा के करकमलों द्वारा मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति में सभी आमंत्रित शायरों एवं शाइरात को स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया। इसके बाद पारंपरिक रीति से शम्अ-ए-मुशायरा प्रज्वलित कर द्वितीय सत्र का शुभारंभ किया गया।
द्वितीय सत्र का संचालन प्रसिद्ध प्रसारक एवं दूरदर्शन समाचार (उर्दू) के बुलेटिन प्रोड्यूसर डॉ. फ़रमान चौधरी ने अपने विशिष्ट, नफ़ीस और रेशमी अंदाज़ में किया। उन्होंने प्रत्येक शायर एवं शाइरा का अत्यंत प्रभावशाली परिचय प्रस्तुत करते हुए मुशायरे की कार्रवाई को सुरुचिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ाया।
मुशायरे में श्री आलोक श्रीवास्तव ‘अविरल’, जनाब अहमद अल्वी मेरठी, जनाब शाहिद अनवर, जनाब मुईन शादाब, इंस्पेक्टर सुहैब फ़ारूक़ी, डॉ. ख़ालिद मुबश्शिर, डॉ. ख़ान मुहम्मद रिज़वान, मोहतरमा आशकारा ख़ानम कश्फ़, डॉ. फ़रमान चौधरी तथा मोहतरमा तरुणा मिश्रा ने अपने उत्कृष्ट कलाम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। एक से बढ़कर एक ग़ज़लों, नज़्मों और गीतों ने महफ़िल को देर तक बाँधे रखा तथा श्रोताओं ने भरपूर दाद देकर शायरों का उत्साहवर्धन किया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में मुख्य अतिथि श्री आलोक श्रीवास्तव ‘अविरल’ ने दिल्ली पुलिस पब्लिक लाइब्रेरी की मुक्त कंठ से सराहना करते हुए कहा कि अपने तीन दशक से अधिक के प्रशासनिक एवं कॉर्पोरेट जीवन में उन्होंने पुलिस विभाग की छत्रछाया में संचालित ऐसा सामुदायिक जन-संपर्क अभियान पहली बार देखा है, जो बिना किसी प्रचार-प्रसार के पूरे समर्पण के साथ दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में शिक्षा, साहित्य और सामाजिक सरोकारों को आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह पहल देश के लिए एक अनुकरणीय मॉडल सिद्ध हो सकती है। उन्होंने यह भी आश्वस्त किया कि इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन निकट भविष्य में इस मिशन से सहभागी बनकर हरसंभव सहयोग प्रदान करेगा।
मुख्य अतिथि श्री आलोक श्रीवास्तव ‘अविरल’ तथा इंस्पेक्टर सुहैब फ़ारूक़ी द्वारा सभी शायरों एवं शाइरात को स्मृति-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम के अंत में दिल्ली पुलिस पब्लिक लाइब्रेरी के निदेशक मोहम्मद नदीम अख़्तर ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए दिल्ली पुलिस पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा विगत चौदह वर्षों में शिक्षा, पठन-पाठन, साहित्य, संस्कृति तथा सामुदायिक पुलिसिंग के क्षेत्र में किए जा रहे विविध कार्यों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।
इस अवसर पर श्री राजेश चेची (DySP, हरियाणा पुलिस), प्रो. खुर्शीद अंसारी (यूनानी मेडिकल कॉलेज, जामिया हमदर्द), ट्रैफिक इंस्पेक्टर रविन्द्र तोमर, श्रीमती रुबीना, प्रिंसिपल, शिखर स्कूल, बटला हाउस, जामिया नगर, मशहूर शायर जावेद सिद्दीकी सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। दिल्ली पुलिस पब्लिक लाइब्रेरी तथा शिखर गर्ल्स स्कूल के छात्र-छात्राओं ने भी उत्साहपूर्वक सहभागिता की। उपस्थित श्रोताओं ने कार्यक्रम की मुक्तकंठ से सराहना करते हुए इसे साहित्य और सामुदायिक सहभागिता का एक अनुकरणीय आयोजन बताया।
कलाम की बानगी
श्री आलोक श्रीवास्तव ‘अविरल’
आब-ए-ज़मज़म बनो या कि अमृत कभी,
कुछ बनो, कुछ करो तिश्नगी के लिए।
जनाब अहमद अल्वी मेरठी
ये रात के पुजारी तारीकी लाने वाले,
जुगनू से डर गए हैं सूरज बुझाने वाले।
जनाब शाहिद अनवर
आँगन हो या गुलसिताँ, सबका इक मामूल,
ख़ुशबू की पहचान हैं, बच्चे हों या फूल।
जनाब मुईन शादाब
सहाफ़ियों को कहाँ हाल-ए-दिल सुना बैठे,
ज़रा-सी बात कई ज़ावियों से लिखेंगे।
इंस्पेक्टर सुहैब फ़ारूक़ी
दिलों के राज़ सुपुर्द-ए-हवा नहीं करते,
हम अहल-ए-दिल हैं, तमाशा बपा नहीं करते।
डॉ. ख़ालिद मुबश्शिर
पहले हम धूप में झुलसते थे,
अब तो यह छाँव भी जलाती है।
डॉ. ख़ान मुहम्मद रिज़वान
ये ख़द्द-ओ-ख़ाल, ये गेसू, ये सूरत-ए-ज़ेबा,
सभी का हुस्न है अपनी जगह, मगर आँखें…
मोहतरमा आशकारा ख़ानम कश्फ़
कोई भी लफ़्ज़ ज़ूमआनी नहीं है,
मेरे लहजे में उरयानी नहीं है।
डॉ. फ़रमान चौधरी
मेरा भारत, महान भारत है,
इससे बेहतर कोई जगह ही नहीं।
मोहतरमा तरुणा मिश्रा
सूखे हुए शजर से लिपट कर मैं रो पड़ी,
दोनों ने अपनी बेबसी आपस में बाँट ली।






