हमारे समय से संवाद करते संजय !-पवन कुमार पाण्डेय


वाणी और वाणी के महात्म्य को समझना है तो प्रो.संजय द्विवेदी की संगति कीजिए। मौन को पढ़ना सीखना हो, स्निग्धता की तपस्या को जानना हो तो उनके व्यक्तित्व को जानिए, पहचानिए। सच कहूँ, विरले होते हैं वे लोग, जिन्हें चंदन और पारसमणि का स्पर्श हुआ हो जैसा संजय जी भाई साहब को हुआ है। हम बहुत भाग्यशाली हैं कि हमने स्वयं को आधुनिक पत्रकारिता के शुभ्र ललाट की संगति रूपी चंदन-पारसमणि की छुअन से परिष्कृत किया है।
समय के साथ रहना, समय के साथ चलना और अपने समय से संवाद करना किसी को आता है तो वे मीडिया गुरु, पत्रकारों के आदर्श भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक प्रो.(डा.) संजय द्विवेदी हैं। वे कहते हैं भाषाएँ और माताएँ अपने बच्चों से ही सम्मान पाती हैं। तो आपने माँ, मातृभूमि और मातृभाषा को प्रमुख स्थान देकर समाज तथा मीडिया में अपना उच्च स्थान बनाया है। आपने सदैव स्वयं को पत्रकारिता का विद्यार्थी मानकर ही अपने समय से संवाद किया है और आज भी कर रहे हैं। आपका सरल व्यक्तित्व, चंद्रमा-से ओजस्वी चेहरे पर अठखेलियाँ करती चंचल मंद मुस्कुराहट, उन्नत भाल पर संवाद संग घहराती-लहराती-अठखेलियाँ करती विचारों की रेखाएँ, मुखारबिंदु से प्रवाहित परमहंसी धीर-गंभीर वाणी चंदन की भाँति हर ताप-समस्या का त्वरित समाधान ऐसे उपस्थित करती है जैसे कोई नदी अपने जल से बिना लाग-लपेट सबको अभिसिंचित करती बहती रहती है।
‘‘सुबरन को ढूँढत फिरै, कवि, लेखी अरु गौर’’ की भाँति आप सुशब्द-संचय में विश्वास करते हैं मगर भौतिक संपदा को विराग-दृष्टि से देखते हैं। वहीं ज्ञान को वैसे ही बाँटते चलते हैं जैसे बादल अपनी वृष्टि से सबको हरा-भरा कर देता है। आप निरंतर साहित्य ही नहीं अनेकानेक विषयों के पठन-पाठन में तल्लीन रहते हुए लेखन, संपादन, शिक्षण, पर्यटन, मित्रता-वार्ता सब में व्यस्त रहते हैं। जहाँ आपको ‘मीडिया विमर्श’ बहुत पसंद है वहीं विद्यार्थियों, विद्वानों संग विविध विषयों पर जनसाधारण के कल्याणार्थ चर्चा तथा फिल्म देखना भी आपको पसंद है। लेखन की कला, विचारों को सहेजकर उन्हें श्रेष्ठ रूप देकर पाठक को बाँधने की कला आपको अपने पूजनीय पिताश्री परमात्मानाथ द्विवेदी जी से विरासत में मिली है जो स्वयंसिद्ध एक श्रेष्ठ शिक्षक-लेखक हैं।
जैसा हमारा समाज होता है, वैसे ही हमारे समाज के सभी वर्गों के लोग होते हैं। उसी तरह संसार का मीडिया भी है। आपका आदर्श है – त्याग, हर उस भाव से जो बाँधता है, संकीर्ण करता है। ऐसा इसलिए कि आजकल बंधन मानव के अधोपतन का कारण पहले बनता है, उसके परिमार्जन, परिष्कार का बाद में। अतः आपका भाव सदैव शुद्धिकरण का रहता है। आपके संबोधन मनसा-वाचा-कर्मणा में एकनिष्ठ समन्वय के द्वारा पत्रकार-समाज ही नहीं सामान्य जन को भी परिष्कृत करने से पूर्ण रहते हैं। हम सभी को भी यही प्रयास करना चाहिए कि विविध आडंबरो से परे रहकर कर्तव्य का समुचित निर्वहन करें। आपका मानना है कि “मीडिया बहुत छोटी चीज है और समाज बहुत बड़ी चीज है।” मीडिया समाज का एक छोटा-सा हिस्सा है। मीडिया ताकतवर हो सकता है, लेकिन समाज से ताकतवर नहीं हो सकता। आप याद दिलाते रहते हैं कि मीडिया अच्छा हो जाएगा और समाज बुरा रहेगा, ऐसा नहीं हो सकता। समाज अच्छा होगा, तो समाज जीवन के सभी क्षेत्र अच्छे होंगे। जो काम आपको मिला, आपने सत्यनिष्ठा से, प्रामाणिकता से और अपना सब कुछ समर्पित कर उसे पूरा किया। कभी भी ये नहीं सोचा कि ये काम अच्छा है, बुरा है, छोटा है या बड़ा है। साथ ही, कभी भी किसी काम की, किसी दूसरे के काम से तुलना भी नहीं की। किसी भी काम में हमेशा अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास किया। यही आपका मूल मंत्र है।
आपके आदर्श वाक्यों या जीवन की समस्त ऊर्जा से यदि क्षीर ग्रहण करना चाहें तो आपका यह वाक्य सदैव मार्गदर्शक के रूप में अपने पाठकों-श्रोताओं को पथ का दीप बनकर आगे बढ़ाता रहेगा- “मेरे पास यात्राएँ हैं, कर्म हैं और साथ हैं उनसे उपजी सफलताएँ।” कर्मों में कुशाग्रता, सकारात्मक व्यवहार, मन में निश्छलता, हृदय में एकाग्रता, विनम्रता, स्पष्टवादिता और हँसमुख स्वभाव सहित नीति-निपुणता तमाम आपकी स्वाभाविक विशेषताएँ हैं और इन्हीं गुणों के कारण आपके संपर्क में आने वाला हर व्यक्ति आपका प्रशंसक बन जाता है। सच कहा जाए तो पत्रकारिता की व्यापक सृष्टि में आप ‘अजातशत्रु‘ हैं । आपका व्यक्तित्व सत्यनिष्ठा, उत्तरदायित्व और भारतीय विचारधारा का विलक्षण समन्वय है जिसमें विनम्रता-कोमलता का भाव वैसे ही दृश्यमान होता है जैसे कस्तूरी तथा उसकी सुगंध। वह मृग जीवन भर सुगंध खोजता है लेकिन आप खोजते नहीं बल्कि स्वयं अपने ज्ञान का सौरभ सभी पर बड़े प्यार से उँड़ेल देते हैं। वह अपनापन, वह स्नेहिल संग, वह कंधे पर थपकी सब कुछ इतना सहज कि बड़े से बड़ा भी नतमस्तक हुए बिना न रहे।
भारतीय जन संचार संस्थान के स्थापना दिवस के उपलक्ष में दिए एक इंटरव्यू में समकालीन पत्रकारिता के सामने मौजूद चुनौतियों के बारे में द्विवेदी जी कहते हैं- “हमें सवाल खड़े करने वाला ही नहीं बनना है, इस देश के संकटों को हल करने वाला पत्रकार भी बनना है। मीडिया का उद्देश्य अंततः लोकमंगल है। यही साहित्य व अन्य प्रदर्शनकारी कलाओं का उद्देश्य भी है। इसके साथ देश की समझ आवश्यक तत्व है। देश के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, परंपरा, आर्थिक सामाजिक चिंताओं, संविधान की मूलभूत चिंताओं की गहरी समझ हमारी पत्रकारिता को प्रामाणिक बनाती है। समाज आर्थिक-सामाजिक, धार्मिक रूप से ही नहीं वैचारिक न्याय से युक्त बने। यही न्यायपूर्ण समरस समाज हम सबका साझा स्वप्न है। पत्रकारिता अपने इस कठिन दायित्वबोध से अलग नहीं हो सकती। इसमें शक नहीं कि आज मीडिया एजेंडा केन्द्रित पत्रकारिता और वस्तुनिष्ठ और निरपेक्ष पत्रकारिता के बीच बंट गया है। यह स्थिति स्वयं मीडिया की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगाती है।”
वस्तुतः संजय जी वर्तमान के लिए वही कार्य कर रहे हैं जो हमारे ऋषियों ने किया था। उन्होंने युगबोध का कार्य किया और आप भी अपनी यात्राओं, संगोष्ठियों द्वारा राष्ट् बोध जाग्रत करने का पुनीत कर्म कर रहे हैं। आपके जन्म दिवस पर यही सच्ची कामना होगी कि विश्व शुद्धिकरण, अंतःकरण में मानव प्रेम की ज्योत जगाने की यह करुणामय यात्रा सभी को अभिसिंचित करती अनन्तकाल तक प्रवाहित होती रहे।
(लेखक अखिल भारतीय साहित्य परिषद जोधपुर प्रांत- राजस्थान के प्रचार प्रमुख हैं।)

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